भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 2247

पितृशेषेण विप्रांश्च संविभज्याश्रितांश्च सः ।
शेषान्नभुक् सत्यपरः सर्वभूतेष्वहिंसकः ॥ २० ॥
जो पहले भगवान् सूर्यके मुखसे प्रकट हुआ था, उस वैष्णव शास्त्रोक्त विधिका आश्रय ले वे प्रथम तो देवेश्वर भगवान् नारायणका पूजन करते। फिर उनकी सेवासे बचे हुए पदार्थोंसे पितरोंका, पितरोंकी सेवासे बचे हुए पदार्थोंसे ब्राह्मणोंका तथा अन्य आश्रितजनोंका विभागपूर्वक सत्कार करते थे। सबको देनेके अनन्तर बचे हुए अन्नका भोजन करते थे, सत्यमें तत्पर रहते और किसी भी प्राणीकी हिंसा नहीं करते थे ॥ १९-२० ॥
सर्वभावेन भक्तः स देवदेवं जनार्दनम् ।
अनादिमध्यनिधनं लोककर्तारमव्ययम् ॥ २१ ॥
वे आदि, मध्य और अन्तसे रहित, अविनाशी, लोककर्ता देवदेव जनार्दनके भजनमें सम्पूर्णभावसे लगे रहते थे ॥ २१ ॥
तस्य नारायणे भक्तिं वहतोऽमित्रकर्षणः ।
एकशय्यासनं देवो दत्तवान् देवराट् स्वयम् ॥ २२ ॥
भगवान् नारायणमें भक्ति रखनेवाले उस शत्रुसूदन नरेशपर प्रसन्न हो देवराज इन्द्र उन्हें अपने साथ एक शय्या और एक आसनपर बिठाया करते थे ॥ २२ ॥
आत्मराज्यं धनं चैव कलत्रं वाहनं तथा ।
यत्तद्भागवतं सर्वमिति तत् प्रोक्षितं सदा ॥ २३ ॥
राजा उपरिचरने अपने राज्य, धन, स्त्री और वाहन आदि सब उपकरणोंको भगवान्‌की ही वस्तु समझकर सब उन्हींको समर्पित कर रखा था ॥ २३ ॥
काम्यनैमित्तिका राजन् यज्ञियाः परमक्रियाः ।
सर्वाः सात्वतमास्थाय विधिं चक्रे समाहितः ॥ २४ ॥
राजन्! वे सदा सावधान रहकर सकाम और नैमित्तिक यज्ञोंकी सम्पूर्ण क्रियाओंको वैष्णवशास्त्रोक्त विधिसे सम्पन्न किया करते थे ॥ २४ ॥
पाञ्चरात्रविदो मुख्यास्तस्य गेहे महात्मनः ।
प्रायणं भगवत्प्रोक्तं भुञ्जते वाग्रभोजनम् ॥ २५ ॥
उन महात्मा नरेशके घरमें पाञ्चरात्र शास्त्रके मुख्य-मुख्य विद्वान् सदा मौजूद रहते थे; और भगवान्‌को समर्पित किया हुआ प्रसाद अथवा भोज्य पदार्थ सबसे पहले वे ही भोजन करते थे ॥ २५ ॥
तस्य प्रशासतो राज्यं धर्मेणामित्रघातिनः ।
नानृता वाक् समभवन्मनो दुष्टं न चाभवत् ॥ २६ ॥
न च कायेन कृतवान् स पापं परमाण्वपि ।