भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2248

धर्मपूर्वक राज्यका शासन करते हुए उन शत्रुघाती नरेशने न तो कभी असत्य भाषण किया और न कभी उनका मन ही बुरे विचारोंसे दूषित हुआ। अपने शरीरके द्वारा उन्होंने कभी छोटे-से-छोटा पाप भी नहीं किया था ।। २६ १/२ ।।

ये हि ते ऋषयः ख्याताः सप्त चित्रशिखण्डिनः ।। २७ ।। तैरेकमतिभिर्भूत्वा यत् प्रोक्तं शास्त्रमुत्तमम् । वेदैश्चतुर्भिः समितं कृतं मेरौ महागिरौ ।। २८ ।। आस्यैः सप्तभिरुद्गीर्णं लोकधर्ममनुत्तमम् । मरीचिरत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः । वसिष्ठश्च महातेजास्ते हि चित्रशिखण्डिनः ।। २९ ।।

(अब मैं जिस प्रकार तन्त्र, स्मृति और आगमकी उत्पत्ति हुई है, उसे बताता हूँ, सुनो—) मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और महातेजस्वी वसिष्ठ—ये सात प्रसिद्ध ऋषि चित्रशिखण्डी कहलाते हैं। ये जो चित्रशिखण्डी नामसे विख्यात सात ऋषि हैं, इन्होंने महागिरि मेरुपर एकमत होकर जिस उत्तम शास्त्रका प्रवचन एवं निर्माण किया, वह चारों वेदोंके समान आदरणीय एवं प्रमाणभूत है। उसमें सात मुखोंसे प्रकट हुए उत्तम लोकधर्मकी व्याख्या हुई है ।। २७—२९ ।।

सप्त प्रकृतयो ह्येतास्तथा स्वायम्भुवोऽष्टमः । एताभिर्धार्यते लोकस्ताभ्यः शास्त्रं विनिःसृतम् ।। ३० ।। एकाग्रमनसो दान्ता मुनयः संयमे रताः । भूतभव्यभविष्यज्ञाः सत्यधर्मपरायणाः ।। ३१ ।।

ये सातों ऋषि प्रकृतिके सात रूप हैं अर्थात् प्रजाके स्रष्टा हैं। आठवाँ ब्रह्मा है। ये सब मिलकर इस सम्पूर्ण जगत्को धारण करते हैं। इन्हींके द्वारा शास्त्रका प्राकट्य हुआ है। ये सब-के-सब ऋषि एकाग्रचित्त, जितेन्द्रिय, संयमपरायण, भूत, भविष्य और वर्तमानके ज्ञाता तथा सत्य-धर्ममें तत्पर रहनेवाले हैं ।। ३०-३१ ।।

इदं श्रेय इदं ब्रह्म इदं हितमनुत्तमम् । लोकान् संचिन्त्य मनसा ततः शास्त्रं प्रचक्रिरे ।। ३२ ।।

इन्होंने मन-ही-मन यह सोचकर कि अमुक साधनसे जगत्का कल्याण होगा, अमुकसे परमात्माकी प्राप्ति होगी तथा अमुक उपायसे संसारका सर्वोत्तम हितसाधन होगा, शास्त्रकी रचना की ।। ३२ ।।

तत्र धर्मार्थकामा हि मोक्षः पश्चाच्च कीर्तितः । मर्यादा विविधाश्चैव दिवि भूमौ च संस्थिताः ।। ३३ ।।

उसमें पहले धर्म, अर्थ, और कामका फिर मोक्षका भी वर्णन है तथा स्वर्ग एवं मर्त्यलोकमें प्रचलित नाना प्रकारकी मर्यादाओंका भी प्रतिपादन किया गया है ।। ३३ ।।

आराध्य तपसा देवं हरिं नारायणं प्रभुम् ।