भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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षट्त्रिंशोऽध्यायः

स्वायम्भुव मनुके कथनानुसार धर्मका स्वरूप, पापसे शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त, अभक्ष्य वस्तुओंका वर्णन तथा दानके अधिकारी एवं अनधिकारीका विवेचन

युधिष्ठिर उवाच

किं भक्ष्यं चाप्यभक्ष्यं च किं च देयं प्रशस्यते ।
किं च पात्रमपात्रं वा तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! क्या भक्ष्य है और क्या अभक्ष्य? किस वस्तुका दान उत्तम माना जाता है? कौन दानका पात्र है अथवा कौन अपात्र? यह सब मुझे बताइये ॥ १ ॥

व्यास उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
सिद्धानां चैव संवादं मनोश्चैव प्रजापतेः ॥ २ ॥
**व्यासजी बोले—**राजन्! इस विषयमें लोग प्रजापति मनु और सिद्ध पुरुषोंके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ २ ॥
ऋषयस्तु व्रतपराः समागम्य पुरा विभुम् ।
धर्मं पप्रच्छुरासीनमादिकाले प्रजापतिम् ॥ ३ ॥
पहलेकी बात है एक समय बहुत-से व्रतपरायण तपस्वी ऋषि एकत्र हो प्रजापति राजा मनुके पास गये और उन बैठे हुए नरेशसे धर्मकी बात पूछते हुए बोले— ॥
कथमन्नं कथं पात्रं दानमध्ययनं तपः ।
कार्याकार्यं च यत् सर्वं शंस वै त्वं प्रजापते ॥ ४ ॥
‘प्रजापते! अन्न क्या है? पात्र कैसा होना चाहिये? दान, अध्ययन और तपका क्या स्वरूप है? क्या कर्तव्य है और क्या अकर्तव्य? यह सब हमें बताइये’ ॥ ४ ॥
तैरेवमुक्तो भगवान् मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ।
श्रुश्रूषध्वं यथावृत्तं धर्मं व्याससमासतः ॥ ५ ॥
उनके इस प्रकार पूछनेपर भगवान् स्वायम्भुव मनुने कहा—‘महर्षियो! मैं संक्षेप और विस्तारके साथ धर्मका यथार्थ स्वरूप बताता हूँ, आपलोग सुनें ॥ ५ ॥
अनादेशे जपो होम उपवासस्तथैव च ।
आत्मज्ञानं पुण्यनद्यो यत्र प्रायश्च तत्पराः ॥ ६ ॥
अनादिष्टं तथैतानि पुण्यानि धरणीभृतः ।