महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 378, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ें'घमण्डमें भरकर कर्तव्य और अकर्तव्यका ज्ञान न रखनेवाला तथा कुमार्गपर चलनेवाला मुनष्य यदि अपना गुरु हो तो उसे भी दण्ड देनेका सनातन विधान है' ।। ७ ।।
बाहोः पुत्रेण राज्ञा च सगरेण च धीमता । असमञ्जाः सुतो ज्येष्ठस्त्यक्तः पौरहितैषिणा ।। ८ ।। बाहुके पुत्र बुद्धिमान् राजा सगरने तो पुरवासियोंके हितकी इच्छासे अपने ज्येष्ठ पुत्र असमंजाका भी त्याग कर दिया था ।। ८ ।।
असमञ्जाः सरय्वां स पौराणां बालकान् नृप । न्यमज्जयदतः पित्रा निर्भर्त्स्य स विवासितः ।। ९ ।। नरेश्वर! असमंजा पुरवासियोंके बालकोंको पकड़कर सरयूनदीमें डुबा दिया करता था; अतः उसके पिताने उसे दुत्कारकर घरसे बाहर निकाल दिया ।। ९ ।।
ऋषिणोद्दालकेनापि श्वेतकेतुर्महातपाः । मिथ्या विप्रानुपचरन् संत्यक्तो दयितः सुतः ।। १० ।। उद्दालक ऋषिने अपने प्रिय पुत्र महातपस्वी श्वेतकेतुको केवल इस अपराधसे त्याग दिया कि वह ब्राह्मणोंके साथ मिथ्या एवं कपटपूर्ण व्यवहार करता था ।। १० ।।
लोकरञ्जनमेवात्र राज्ञां धर्मः सनातनः । सत्यस्य रक्षणं चैव व्यवहारस्य चार्जवम् ।। ११ ।। अतः इस लोकमें प्रजावर्गको प्रसन्न रखना ही राजाओंका सनातन धर्म है। सत्यकी रक्षा और व्यवहारकी सरलता ही राजोचित कर्तव्य है ।। ११ ।।
न हिंस्यात् परवित्तानि देयं काले च दापयेत् । विक्रान्तः सत्यवाक् क्षान्तो नृपो न चलते पथः ।। १२ ।। दूसरोंके धनका नाश न करे। जिसको जो कुछ देना हो, उसे वह समयपर दिलानेकी व्यवस्था करे। पराक्रमी, सत्यवादी और क्षमाशील बना रहे—ऐसा करनेवाला राजा कभी पथभ्रष्ट नहीं होता ।। १२ ।।
आत्मवांश्च जितक्रोधः शास्त्रार्थकृतनिश्चयः । धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च सततं रतः ।। १३ ।। त्रय्यां संवृतमन्त्रश्च राजा भवितुमर्हति । वृजिनं च नरेन्द्राणां नान्यच्चारक्षणात् परम् ।। १४ ।। जिसने अपने मनको वशमें कर लिया है, क्रोधको जीत लिया है तथा शास्त्रोंके सिद्धान्तका निश्चयात्मक ज्ञान प्राप्त कर लिया है, जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके प्रयत्नमें निरन्तर लगा रहता है, जिसे तीनों वेदोंका ज्ञान है तथा जो अपने गुप्त विचारोंको दूसरोंपर प्रकट नहीं होने देता है, वही राजा होने योग्य है, प्रजाकी रक्षा न करनेसे बढ़कर राजाओंके लिये दूसरा कोई पाप नहीं है ।। १३-१४ ।।
चातुर्वर्ण्यस्य धर्मांश्च रक्षितव्या महीक्षिता ।