भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 379

धर्मसंकररक्षा च राज्ञां धर्मः सनातनः ॥ १५ ॥
राजाको चारों वर्णोंके धर्मोंकी रक्षा करनी चाहिये, प्रजाको धर्मसंकरतासे बचाना राजाओंका सनातन धर्म है ॥ १५ ॥
न विश्वसेच्च नृपतिर्न चात्यर्थं च विश्वसेत् ।
षाड्गुण्यगुणदोषांश्च नित्यं बुद्ध्यावलोकयेत् ॥ १६ ॥
राजा किसीपर भी विश्वास न करे। विश्वसनीय व्यक्तिका भी अत्यन्त विश्वास न करे। राजनीतिके छः गुण होते हैं—सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और समाश्रय*। इन सबके गुण-दोषोंका अपनी बुद्धिद्वारा सदा निरीक्षण करे ॥ १६ ॥
द्विच्छिद्रदर्शी नृपतिर्नित्यमेव प्रशस्यते ।
त्रिवर्ग विदितार्थश्च युक्तचारोपधिश्च यः ॥ १७ ॥
शत्रुओंके छिद्र देखनेवाले राजाकी सदा ही प्रशंसा की जाती है। जिसे धर्म, अर्थ और कामके तत्त्वका ज्ञान है तथा जिसने शत्रुओंकी गुप्त बातोंको जानने और उनके मन्त्री आदिको फोड़नेके लिये गुप्तचर लगा रखा है, वह भी प्रशंसाके ही योग्य है ॥ १७ ॥
कोशस्योपार्जनरतिर्यमवैश्रवणोपमः ।
वेत्ता च दशवर्गस्य स्थानवृद्धिक्षयात्मनः ॥ १८ ॥
राजाको उचित है कि वह सदा अपने कोषागारको भरा-पूरा रखनेका प्रयत्न करता रहे, उसे न्याय करनेमें यमराज और धन-संग्रह करनेमें कुबेरके समान होना चाहिये। वह स्थान, वृद्धि तथा क्षयके हेतुभूत दस* वर्गोंका सदा ज्ञान रखे ॥ १८ ॥
अभृतानां भवेद् भर्ता भृतानामन्ववेक्षकः ।
नृपतिः सुमुखश्च स्यात् स्मितपूर्वाभिभाषिता ॥ १९ ॥
जिनके भरण-पोषणका प्रबन्ध न हो उनका पोषण राजा स्वयं करे और उसके द्वारा जिनका भरण-पोषण चल रहा हो, उन सबकी देखभाल रखे। राजाको सदा प्रसन्नमुख रहना और मुसकराते हुए वार्तालाप करना चाहिये ॥ १९ ॥
उपासिता च वृद्धानां जिततन्द्रिरलोलुपः ।
सतां वृत्ते स्थितमतिः संतोष्यश्चारुदर्शनः ॥ २० ॥
राजाको वृद्ध पुरुषोंकी उपासना (सेवा या संग) करनी चाहिये, वह आलस्यको जीते और लोलुपताका परित्याग करे। सत्पुरुषोंके व्यवहारमें मन लगावे। संतुष्ट होने योग्य स्वभाव बनाये रखे। वेश-भूषा ऐसी रखे, जिससे वह देखनेमें अत्यन्त मनोहर जान पड़े ॥ २० ॥
न चाददीत वित्तानि सतां हस्तात् कदाचन ।
असदभ्यश्च समादद्यात् सद्‍भ्यस्तु प्रतिपादयेत् ॥ २१ ॥