महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 510, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुःसप्ततितमोऽध्यायः
ब्राह्मण और क्षत्रियके मेलसे लाभका प्रतिपादन करनेवाला मुचुकुन्दका उपाख्यान
भीष्म उवाच
योगक्षेमो हि राष्ट्रस्य राजन्यायत्त उच्यते ।
योगक्षेमो हि राज्ञो हि समायत्ततः पुरोहिते ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! राष्ट्रका योगक्षेम राजाके अधीन बताया जाता है; परंतु राजाका योगक्षेम पुरोहितके अधीन है ॥ १ ॥
यत्रादृष्टं भयं ब्रह्म प्रजानां शमयत्युत ।
दृष्टं च राजा बाहुभ्यां तद् राज्यं सुखमेधते ॥ २ ॥
जहाँ ब्राह्मण अपने तेजसे प्रजाके अदृष्ट भयका निवारण करता है और राजा अपने बाहुबलसे दृष्ट भयको दूर करता है, वह राज्य-सुखसे उत्तरोत्तर उन्नति करता है ॥ २ ॥
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
मुचुकुन्दस्य संवादं राज्ञो वैश्रवणस्य च ॥ ३ ॥
इस विषयमें विज्ञ पुरुष मुचुकुन्द और राजा कुबेरके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ ३ ॥
मुचुकुन्दो विजित्येमां पृथिवीं पृथिवीपतिः ।
जिज्ञासमानः स्वबलमभ्ययादलकाधिपम् ॥ ४ ॥
कहते हैं, पृथिवीपति राजा मुचुकुन्दने इस पृथिवीको जीतकर अपने बलकी परीक्षा लेनेके लिये अलकापति कुबेरपर चढ़ाई की ॥ ४ ॥
ततो वैश्रवणो राजा राक्षसानसृजत् तदा ।
ते बलान्यवमृद्नन्त मुचुकुन्दस्य नैर्ऋताः ॥ ५ ॥
तब राजा कुबेरने उनका सामना करनेके लिये राक्षसोंकी सेना भेजी। उन राक्षसोंने मुचुकुन्दकी सेनाओंको कुचलना आरम्भ किया ॥ ५ ॥
स हन्यमाने सैन्ये स्वे मुचुकुन्दो नराधिपः ।
गर्हयामास विद्वांसं पुरोहितमरिंदमः ॥ ६ ॥
इस प्रकार अपनी सेनाको मारी जाती देखकर शत्रुदमन राजा मुचुकुन्दने अपने विद्वान् पुरोहित वसिष्ठजीको इसके लिये उलाहना दिया ॥ ६ ॥
तत उग्रं तपस्तप्त्वा वसिष्ठो धर्मवित्तमः ।
रक्षांस्युपावधीत् तस्य पन्थानं चाप्यविन्दत ॥ ७ ॥