महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 528, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंजहाँ ब्राह्मण संयमपूर्ण जीवन बिता रहे हों वहाँ यक्ष, राक्षस, पिशाच तथा असुरोंसे किसी प्रकार भय नहीं प्राप्त होता ॥
यस्मात् सर्वास्ववस्थासु धर्ममेवान्वेक्षसे ।
तस्मात् प्राप्नुहि कैकेय गृहं स्वस्ति व्रजाम्यहम् ॥ २९ ॥
केकयनरेश! तुम सभी अवस्थाओंमें धर्मपर ही दृष्टि रखते हो, इसलिये कुशलपूर्वक घरको जाओ। तुम्हारा कल्याण हो। मैं अब जाता हूँ ॥ २९ ॥
येषां गोब्राह्मणं रक्ष्यं प्रजा रक्ष्याश्च केकय ।
न रक्षोभ्यो भयं तेषां कुत एव तु पावकात् ॥ ३० ॥
केकयराज! जो राजा गौओं तथा ब्राह्मणोंकी रक्षा करते हैं और प्रजाका पालन करना अपना धर्म समझते हैं, उन्हें राक्षसोंसे भय नहीं है; फिर अग्निसे तो हो ही कैसे सकता है? ॥ ३० ॥
येषां पुरोगमा विप्रा येषां ब्रह्म परं बलम् ।
अतिथिप्रियास्तथा पौरास्ते वै स्वर्गजितो नृपाः ॥ ३१ ॥
जिनके आगे-आगे ब्राह्मण चलते हैं, जिनका सबसे बड़ा बल ब्राह्मण ही हैं, तथा जिनके राज्यके नागरिक अतिथि-सत्कारके प्रेमी हैं, वे नरेश निश्चय ही स्वर्गलोकपर अधिकार प्राप्त कर लेते हैं ॥ ३१ ॥
भीष्म उवाच
तस्माद् द्विजातीन् रक्षेत् ते हि रक्षन्ति रक्षिताः ।
आशीरेषां भवेद् राजन् राज्ञां सम्यक्प्रवर्तताम् ॥ ३२ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! इसलिये ब्राह्मणोंकी सदा रक्षा करनी चाहिये। सुरक्षित रहनेपर वे राजाओंकी रक्षा करते हैं। ठीक-ठीक बर्ताव करनेवाले राजाओंको ब्राह्मणोंका आशीर्वाद प्राप्त होता है ॥ ३२ ॥
तस्माद् राज्ञा विशेषेण विकर्मस्था द्विजातयः ।
नियम्याः संविभाज्याश्च तदनुग्रहकारणात् ॥ ३३ ॥
अतः राजाओंको चाहिये कि वे विपरीत कर्म करने-वाले ब्राह्मणोंको उनपर अनुग्रह करनेके लिये ही नियन्त्रणमें रखें और उनकी आवश्यकताकी वस्तुएँ उन्हें देते रहें ॥
एवं यो वर्तते राजा पौरजानपदेष्विह ।
अनुभूयेह भद्राणि प्राप्नोतीन्द्रसलोकताम् ॥ ३४ ॥
जो राजा अपने नगर और राष्ट्रकी प्रजाके साथ ऐसा धर्मपूर्ण बर्ताव करता है, वह इस लोकमें सुख भोगकर अन्तमें इन्द्रलोक प्राप्त कर लेता है ॥ ३४ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि कैकेयोपाख्याने सप्तसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७७ ॥