भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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अष्टसप्ततितमोऽध्यायः

आपत्तिकालमें ब्राह्मणके लिये वैश्यवृत्तिसे निर्वाह करनेकी छूट तथा लुटेरोंसे अपनी और दूसरोंकी रक्षा करनेके लिये सभी जातियोंको शस्त्र धारण करनेका अधिकार एवं रक्षकको सम्मानका पात्र स्वीकार करना

युधिष्ठिर उवाच

व्याख्याता राजधर्मेण वृत्तिरापत्सु भारत ।
कथं स्विद् वैश्यधर्मेण संजीवेद् ब्राह्मणो न वा ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भरतनन्दन! आपने ब्राह्मणके लिये आपत्तिकालमें क्षत्रियधर्मसे जीविका चलानेकी बात पहले बतायी है। अब मैं यह जानना चाहता हूँ कि ब्राह्मण किसी तरह वैश्य-धर्मसे भी जीवन-निर्वाह कर सकता है या नहीं? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अशक्तः क्षत्रधर्मेण वैश्यधर्मेण वर्तयेत् ।
कृषिगोरक्ष्यमास्थाय व्यसने वृत्तिसंक्षये ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! यदि ब्राह्मण अपनी जीविका नष्ट होनेपर आपत्तिकालमें क्षत्रियधर्मसे भी जीवननिर्वाह न कर सके तो वैश्यधर्मके अनुसार खेती और गोरक्षाका आश्रय लेकर वह अपनी जीविका चलावे ॥

युधिष्ठिर उवाच

कानि पण्यानि विक्रीय स्वर्गलोकान्न हीयते ।
ब्राह्मणो वैश्यधर्मेण वर्तयन् भरतर्षभ ॥ ३ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भरतश्रेष्ठ! यह तो बताइये कि यदि ब्राह्मण वैश्यधर्मसे जीविका चलाते समय व्यापार भी करे तो किन-किन वस्तुओंका क्रय-विक्रय करनेसे वह स्वर्गलोककी प्राप्तिके अधिकारसे वञ्चित नहीं होगा ॥ ३ ॥

भीष्म उवाच

सुरा लवणमित्येव तिलान् केसरिणः पशून् ।
वृषभान् मधुमांसं च कृतान्नं च युधिष्ठिर ॥ ४ ॥
सर्वास्ववस्थास्वेतानि ब्राह्मणः परिवर्जयेत् ।
एतेषां विक्रयात् तात ब्राह्मणो नरकं व्रजेत् ॥ ५ ॥