महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 541, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंअशीतितमोऽध्यायः
राजाके लिये मित्र और अमित्रकी पहचान तथा उन सबके साथ नीतिपूर्ण बर्तावका और मन्त्रीके लक्षणोंका वर्णन
युधिष्ठिर उवाच
यदप्यल्पतरं कर्म तदप्येकेन दुष्करम् ।
पुरुषेणासहायेन किमु राज्ञा पितामह ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! जो छोटे-से-छोटा काम है, उसे भी बिना किसीकी सहायताके अकेले मनुष्यके द्वारा किया जाना कठिन हो जाता है। फिर राजा दूसरेकी सहायताके बिना महान् राज्यका संचालन कैसे कर सकता है? ॥ १ ॥
किंशीलः किंसमाचारो राज्ञोऽथ सचिवो भवेत् ।
कीदृशे विश्वसेद् राजा कीदृशे न च विश्वसेत् ॥ २ ॥
अतः राजाकी सहायताके लिये जो सचिव (मन्त्री) हो, उसका स्वभाव और आचरण कैसा होना चाहिये? राजा कैसे मन्त्रीपर विश्वास करे और कैसे पर न करे? ॥ २ ॥
भीष्म उवाच
चतुर्विधानि मित्राणि राज्ञां राजन् भवन्त्युत ।
सहार्थो भजमानश्च सहजः कृत्रिमस्तथा ॥ ३ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! राजाके सहायक या मित्र चार प्रकारके होते हैं—१-सहार्थ २-भजमान ३-सहज और ४-कृत्रिम* ॥ ३ ॥
धर्मात्मा पञ्चमश्चापि मित्रं नैकस्य न द्वयोः ।
यतो धर्मस्ततो वा स्याद् धर्मस्थो वा ततो भवेत् ॥ ४ ॥
यस्तस्यार्थो न रोचेत न तं तस्य प्रकाशयेत् ।
धर्माधर्मेण राजानश्चरन्ति विजिगीषवः ॥ ५ ॥
इनके सिवा, राजाका एक पाँचवाँ मित्र धर्मात्मा पुरुष होता है, वह किसी एकका पक्षपाती नहीं होता और न दोनों पक्षोंसे वेतन लेकर कपटपूर्वक दोनोंका ही मित्र बना रहता है। जिस पक्षमें धर्म होता है, उसी ओर वह भी हो जाता है अथवा जो धर्मपरायण राजा है, वही उसका आश्रय ग्रहण कर लेता है। ऐसे धर्मात्मा पुरुषको जो कार्य न रुचे, वह उसके सामने नहीं प्रकाशित करना चाहिये; क्योंकि विजयकी इच्छा रखनेवाले राजा कभी धर्ममार्गसे चलते हैं और कभी अधर्ममार्गसे ॥ ४-५ ॥
चतुर्णां मध्यमौ श्रेष्ठौ नित्यं शङ्क्यौ तथापरौ ।
सर्वे नित्यं शङ्कितव्याः प्रत्यक्षं कार्यमात्मनः ॥ ६ ॥