भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 542, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 542

उपर्युक्त चार प्रकारके मित्रोंमेंसे भजमान और सहज—ये बीचवाले दो मित्र श्रेष्ठ समझे जाते हैं, किंतु शेष दो की ओरसे सदा सशङ्क रहना चाहिये। वास्तवमें तो अपने कार्यको ही दृष्टिमें रखकर सभी प्रकारके मित्रोंसे सदा सतर्क रहना चाहिये ॥ ६ ॥ न हि राज्ञा प्रमादो वै कर्तव्यो मित्ररक्षणे । प्रमादिनं हि राजानं लोकाः परिभवन्त्युत ॥ ७ ॥ राजाको अपने मित्रोंकी रक्षामें कभी असावधानी नहीं करनी चाहिये; क्योंकि असावधान राजाका सभी लोग तिरस्कार करते हैं ॥ ७ ॥ असाधुः साधुतामेति साधुर्भवति दारुणः । अरिश्च मित्रं भवति मित्रं चापि प्रदुष्यति ॥ ८ ॥ अनित्यचित्तः पुरुषस्तस्मिन् को जातु विश्वसेत् । तस्मात्प्रधानं यत् कार्यं प्रत्यक्षं तत् समाचरेत् ॥ ९ ॥ बुरा मनुष्य भला और भला मनुष्य बुरा हो जाया करता है। शत्रु भी मित्र बन जाता है और मित्र भी बिगड़ जाता है; क्योंकि मनुष्यका चित्त सदैव एक-सा नहीं रहता। अतः उसपर किसी भी समय कोई कैसे विश्वास करेगा? इसलिये जो प्रधान कार्य हो, उसे अपनी आँखोंके सामने पूरा कर देना चाहिये ॥ ८-९ ॥ एकान्तेन हि विश्वासः कृत्स्नो धर्मार्थनाशकः । अविश्वासश्च सर्वत्र मृत्युना च विशिष्यते ॥ १० ॥ किसीपर भी किया हुआ अत्यन्त विश्वास धर्म और अर्थ दोनोंका नाश करनेवाला होता है और सर्वत्र अविश्वास करना भी मृत्युसे बढ़कर है ॥ १० ॥ अकालमृत्युर्विश्वासो विश्वसन् हि विपद्यते । यस्मिन् करोति विश्वासमिच्छतस्तस्य जीवति ॥ ११ ॥ दूसरोंपर किया हुआ पूरा-पूरा विश्वास अकालमृत्युके समान है; क्योंकि अधिक विश्वास करनेवाला मनुष्य भारी विपत्तिमें पड़ जाता है। वह जिसपर विश्वास करता है, उसीकी इच्छापर उसका जीवन निर्भर होता है ॥ तस्माद् विश्वसितव्यं च शङ्कितव्यं च केषुचित् । एषा नीतिगतिस्तात लक्ष्या चैव सनातनी ॥ १२ ॥ इसलिये राजाको कुछ चुने हुए लोगोंपर विश्वास तो करना चाहिये, पर उनकी ओरसे सशङ्क भी रहना चाहिये। तात! यही सनातन नीतिकी गति है। इसे सदा दृष्टिमें रखना चाहिये ॥ १२ ॥ यं मन्येत ममाभावादिममर्थागमं स्पृशेत् । नित्यं तस्माच्छङ्कितव्यममित्रं तद् विदुर्बुधाः ॥ १३ ॥ ‘अमुक व्यक्ति मेरे मरनेके बाद राजा हो सकता है और धनकी यह सारी आय अपने हाथमें ले सकता है’ ऐसी मान्यता जिसके विषयमें हो (वह भाई, पड़ोसी या पुत्र ही क्यों न