भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 713, कुल 2450 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 713

मुनिके इस प्रकार कहनेपर राजाने उन पूजनीय ब्राह्मणशिरोमणि महर्षिका पूजन और आदर-सत्कार करके उनकी बातका अनुमोदन करते हुए इस तरह उत्तर दिया ॥ २० ॥ यथा ब्रूयान्महाप्राज्ञो यथा ब्रूयान्महाश्रुतः । श्रेयस्कामो यथा ब्रूयादुभयोरेव तत् क्षमम् ॥ २१ ॥ 'कोई महाबुद्धिमान्-जैसी बात कह सकता है, कोई महाविद्वान्-जैसी वाणी बोल सकता है, तथा दूसरोंका कल्याण चाहनेवाला महापुरुष जैसा उपदेश दे सकता है, वैसी ही बात आपने कही है। यह हम दोनोंके लिये ही शिरोधार्य करने योग्य है ॥ २१ ॥ यद् यद् वचनमुक्तोऽस्मि करिष्यामि च तत् तथा । एतद्धि परमं श्रेयो न मेऽत्रास्ति विचारणा ॥ २२ ॥ 'भगवन्! आपने मेरे लिये जो-जो आदेश दिया है, उसका मैं उसी रूपमें पालन करूँगा। यह मेरे लिये परम कल्याणकी बात है। इसके सम्बन्धमें मुझे दूसरा कोई विचार नहीं करना है' ॥ २२ ॥ ततः कौसल्यमाहूय मैथिलो वाक्यमब्रवीत् । धर्मतो नीतितश्चैव लोकश्च विजितो मया ॥ २३ ॥ अहं त्वया चात्मगुणैर्जितः पार्थिवसत्तम । आत्मानमनवज्ञाय जितवद् वर्ततां भवान् ॥ २४ ॥ तदनन्तर मिथिलानरेशने कोसल-राजकुमारको अपने निकट बुलाकर कहा—'नृपश्रेष्ठ! मैंने धर्म और नीतिका सहारा लेकर सम्पूर्ण जगत्पर विजय पायी है, परंतु आज तुमने अपने गुणोंसे मुझे भी जीत लिया। अतः तुम अपनी अवज्ञा न करके एक विजयी वीरके समान बर्ताव करो ॥ २३-२४ ॥ नावमन्यामि ते बुद्धिं नावमन्ये च पौरुषम् । नावमन्ये जयामीति जितवद् वर्ततां भवान् ॥ २५ ॥ 'मैं तुम्हारी बुद्धिका अनादर नहीं करता, तुम्हारे पुरुषार्थकी अवहेलना नहीं करता और विजयी हूँ, यह सोचकर तुम्हारा तिरस्कार भी नहीं करता; अतः तुम विजयी वीरके समान बर्ताव करो ॥ २५ ॥ यथावत् पूजितो राजन् गृहं गन्तासि मे भृशम् । ततः सम्पूज्य तौ विप्रं विश्वस्तौ जग्मतुर्गृहान् ॥ २६ ॥ 'राजन्! तुम मेरेद्वारा भलीभाँति सम्मानित होकर मेरे घर पधारो।' इतना कहकर वे दोनों परस्पर विश्वस्त हो उन ब्रह्मर्षिकी पूजा करके घरकी ओर चल दिये ॥ २६ ॥ वैदेहस्त्वथ कौसल्यं प्रवेश्य गृहमञ्जसा । पाद्यार्घ्यमधुपर्कैस्तं पूजार्हं प्रत्यपूजयत् ॥ २७ ॥ विदेहराजने कोसल-राजकुमारको आदरपूर्वक अपने महलके भीतर ले जाकर अपने उस पूजनीय अतिथिका पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय तथा मधुपर्कके द्वारा पूजन