भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 719

कुलेषु कलहा जाताः कुलवृद्धैरुपेक्षिताः ।। २७ ।।
गोत्रस्य नाशं कुर्वन्ति गणभेदस्य कारकम् ।
कुलोंमें जो कलह होते हैं, उनकी यदि कुलके वृद्ध पुरुषोंने उपेक्षा कर दी तो वे कलह गणोंमें फूट डालकर समस्त कुलका नाश कर डालते हैं ।। २७ १/२ ।।
आभ्यन्तरं भयं रक्ष्यमसारं बाह्यतो भयम् ।। २८ ।।
आभ्यन्तरं भयं राजन् सद्यो मूलानि कृन्तति ।
भीतरी भय दूर करके संघकी रक्षा करनी चाहिये। यदि संघमें एकता बनी रहे तो बाहरका भय उसके लिये निःसार है (वह उसका कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता)। राजन्! भीतरका भय तत्काल ही संघराज्यकी जड़ काट डालता है ।। २८ १/२ ।।
अकस्मात् क्रोधमोहाभ्यां लोभाद् वापि स्वभावजात् ।। २९ ।।
अन्योन्यं नाभिभाषन्ते तत्पराभवलक्षणम् ।
अकस्मात् पैदा हुए क्रोध और मोहसे अथवा स्वाभाविक लोभसे भी जब संघके लोग आपसमें बातचीत करना बंद कर दें, तब यह उनकी पराजयका लक्षण है ।। २९ १/२ ।।
जात्या च सदृशाः सर्वे कुलेन सदृशास्तथा ।। ३० ।।
न चोद्योगेन बुद्ध्या वा रूपद्रव्येण वा पुनः ।
भेदाच्चैव प्रदानाच्च भिद्यन्ते रिपुभिर्गणाः ।। ३१ ।।
तस्मात् संघातमेवाहुर्गणानां शरणं महत् ।। ३२ ।।
जाति और कुलमें सभी एक समान हो सकते हैं; परंतु उद्योग, बुद्धि और रूप-सम्पत्तिमें सबका एक-सा होना सम्भव नहीं है। शत्रुलोग गणराज्यके लोगोंमें भेदबुद्धि पैदा करके तथा उनमेंसे कुछ लोगोंको धन देकर भी समूचे संघमें फूट डाल देते हैं; अतः संघबद्ध रहना ही गणराज्यके नागरिकोंका महान् आश्रय है ।। ३०-३२ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि गणवृत्ते
सप्ताधिकशततमोऽध्यायः ।। १०७ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें गणराज्यका बर्तावविषयक एक सौ सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १०७ ।।