महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 751, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वादशाधिकशततमोऽध्यायः
एक तपस्वी ऊँटके आलस्यका कुपरिणाम और राजाका कर्तव्य
युधिष्ठिर उवाच
किं पार्थिवेन कर्तव्यं किं च कृत्वा सुखी भवेत् ।
एतदाचक्ष्व तत्त्वेन सर्वधर्मभृतां वर ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— समस्त धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ पितामह! राजाको क्या करना चाहिये? क्या करनेसे वह सुखी हो सकता है? यह मुझे यथार्थरूपसे बताइये? ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
हन्त तेऽहं प्रवक्ष्यामि शृणु कार्यैकनिश्चयम् ।
यथा राज्ञा कर्तव्यं यच्च कृत्वा सुखी भवेत् ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— नरेश्वर! राजाका जो कर्तव्य है और जो कुछ करके वह सुखी हो सकता है, उस कार्यका निश्चय करके अब मैं तुम्हें बतलाता हूँ, उसे सुनो ॥ २ ॥
न चैवं वर्तितव्यं स्म यथेदमनुशुश्रुम ।
उष्ट्रस्य तु महत् वृत्तं तन्निबोध युधिष्ठिर ॥ ३ ॥
युधिष्ठिर! हमने एक ऊँटका जो महान् वृत्तान्त सुन रखा है, उसे तुम सुनो। राजाको वैसा बर्ताव नहीं करना चाहिये ॥ ३ ॥
जातिस्मरो महानुष्ट्रः प्राजापत्ये युगेऽभवत् ।
तपः सुमहादातिष्ठदरण्ये संशितव्रतः ॥ ४ ॥
प्राजापत्ययुग (सत्ययुग) में एक महान् ऊँट था। उसको पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण था। उसने कठोर व्रतके पालनका नियम लेकर वनमें बड़ी भारी तपस्या आरम्भ की ॥ ४ ॥
तपसस्तस्य चान्तेऽथ प्रीतिमानभवद् विभुः ।
वरेण च्छन्दयामास ततश्चैनं पितामहः ॥ ५ ॥
उस तपस्याके अन्तमें पितामह भगवान् ब्रह्मा बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने उससे वर माँगनेके लिये कहा ॥ ५ ॥
उष्ट्र उवाच
भगवंस्त्वत्प्रसादान्मे दीर्घा ग्रीवा भवेदियम् ।
योजनानां शतं साग्रं गच्छामि चरितुं विभो ॥ ६ ॥