महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 769, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंदृष्ट्वा तं क्रूरमायान्तं जीवितार्थी नराधिप । प्रोवाच श्वा मुनिं तत्र तच्छृणुष्व विशाम्पते ॥ १३ ॥ प्रजानाथ! नरेश्वर! उस क्रूर चीतेको आते देख अपनी प्राणरक्षा चाहते हुए वहाँ कुत्तेने मुनिसे जो कुछ कहा, वह सुनो— ॥ १३ ॥ श्वशत्रुर्भगवन्नेष द्वीपी मां हन्तुमिच्छति । त्वत्प्रसादाद् भयं न स्यादस्मान्मम महामुने ॥ १४ ॥ तथा कुरु महाबाहो सर्वज्ञस्त्वं न संशयः । 'भगवन्! यह चीता कुत्तोंका शत्रु है और मुझे मार डालना चाहता है। महामुने! महाबाहो! आप ऐसा करें, जिससे आपकी कृपासे मुझे इस चीतेसे भय न हो। आप सर्वज्ञ हैं, इसमें संशय नहीं है। (अतः मेरी प्रार्थना सुनकर उसको अवश्य पूर्ण करें)' ॥ १४ १/२ ॥ स मुनिस्तस्य विज्ञाय भावज्ञो भयकारणम् । रुतज्ञः सर्वसत्त्वानां तमैश्वर्यसमन्वितः ॥ १५ ॥ वे सिद्धिके ऐश्वर्यसे सम्पन्न मुनि सबके मनोभावको जाननेवाले और समस्त प्राणियोंकी बोली समझनेवाले थे। उन्होंने उस कुत्तेके भयका कारण जानकर उससे कहा ॥ १५ ॥
मुनिरुवाच
न भयं द्वीपिनः कार्यं मृत्युतस्ते कथंचन । एष श्वरूपरहितो द्वीपी भवसि पुत्रक ॥ १६ ॥ **मुनिने कहा—**बेटा! अपने लिये मृत्युस्वरूप इस चीतेसे तुम्हें किसी प्रकार भय नहीं करना चाहिये। यह लो, तुम अभी कुत्तेके रूपसे रहित चीता हुए जाते हो ॥ १६ ॥ ततः श्वा द्वीपितां नीतो जाम्बूनदनिभाकृतिः । चित्राङ्गो विस्फुरद्दंष्ट्रो वने वसति निर्भयः ॥ १७ ॥ तदनन्तर मुनिने कुत्तेको चीता बना दिया। उसकी आकृति सुवर्णके समान चमकने लगी। उसका सारा शरीर चितकबरा हो गया और बड़ी-बड़ी दाढ़ें चमक उठीं। अब वह निर्भय होकर वनमें रहने लगा ॥ १७ ॥ तं दृष्ट्वा सम्मुखे द्वीपी आत्मनः सदृशं पशुम् । अविरुद्धस्ततस्तस्य क्षणेन समपद्यत ॥ १८ ॥ चीतेने अपने सामने जब अपने ही समान एक पशुको देखा, तब उसका विरोधी भाव क्षणभरमें दूर हो गया ॥ १८ ॥ ततोऽभ्ययान्महारौद्रो व्यादितास्यः क्षुधान्वितः । द्वीपिनं लेलिहद्वक्त्रो व्याघ्रो रुधिरलालसः ॥ १९ ॥ तदनन्तर एक दिन एक महाभयंकर भूखे बाघने उसका रक्त पीनेकी इच्छासे मुँह फैलाकर दोनों जबड़ोंको चाटते हुए उस चीतेका पीछा किया ॥ १९ ॥