महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइन मुनीश्वरकी शरण लेकर जीवन धारण करनेवाले दूसरे भी बहुत-से मृग और पक्षी हैं, जो हाथी तथा दूसरे भयानक जन्तुओंसे भयभीत रहते हैं। सम्भव है, ये उन्हें भी कदाचित् शरभका शरीर प्रदान कर दें, जहाँ संसारके सभी प्राणियोंसे श्रेष्ठ बल प्रतिष्ठित है।।
पक्षिणामप्ययं दद्यात् कदाचिद् गारुडं बलम् ।। यावदन्यस्य सम्प्रीतः कारुण्यं च समाश्रितः । न ददाति बलं तुष्टः सत्त्वस्यान्यस्य कस्यचित् ।। तावदेनमहं विप्रं वधिष्यामि च शीघ्रतः । स्थातुं मया शक्यमिह मुनिघातान्न संशयः ॥)
ये चाहें तो कभी पक्षियोंको भी गरुड़का बल दे सकते हैं। अतः दयाके वशीभूत हो जबतक किसी दूसरे जीवपर संतुष्ट या प्रसन्न हो ये उसे ऐसा ही बल नहीं दे देते, तबतक ही इन ब्रह्मर्षिका मैं शीघ्र वध कर डालूँगा। मुनिका वध हो जानेके पश्चात् मैं यहाँ बेखटके रह सकूँगा, इसमें संशय नहीं है ।।
ततस्तेन तपःशक्त्या विदितो ज्ञानचक्षुषा ।। १९ ।। विज्ञाय स महाप्राज्ञो मुनिः श्वानं तमुक्तवान् ।
ज्ञाननेत्रोंसे युक्त उन मुनीश्वरने अपनी तपःशक्तिसे शरभके उस मनोभावको जान लिया। जानकर उन महाज्ञानी मुनिने उस कुत्तेसे कहा— ।। १९½ ।।
श्वा त्वं द्वीपित्वमापन्नो द्वीपीव्याघ्रत्वमागतः ।। २० ।। व्याघ्रान्नागो मदपटुर्नागः सिंहत्वमागतः । सिंहस्त्वं बलमापन्नो भूयः शरभतां गतः ।। २१ ।।
'अरे! तू पहले कुत्ता था, फिर चीता बना, चीतेसे बाघकी योनिमें आया, बाघसे मदोन्मत्त हाथी हुआ, हाथीसे सिंहकी योनिमें आ गया, बलवान् सिंह रहकर फिर शरभका शरीर पा गया ।। २०-२१ ।।
मया स्नेहपरीतेन विसृष्टो न कुलान्वयः । यस्मादेवमपापं मां पाप हिंसितुमिच्छसि । तस्मात् स्वयोनिमापन्नः श्वैव त्वं हि भविष्यसि ।। २२ ।।
'यद्यपि तू नीच कुलमें पैदा हुआ था, तो भी मैंने स्नेहवश तेरा परित्याग नहीं किया। पापी! तेरे प्रति मेरे मनमें कभी पापभाव नहीं हुआ था, तो भी इस प्रकार तू मेरी हत्या करना चाहता है; अतः तू फिर अपनी पूर्वयोनिमें ही आकर कुत्ता हो जा' ।। २२ ।।
ततो मुनिजनद्वेष्टा दुष्टात्मा प्राकृतोऽबुधः । ऋषिणा शरभः शप्तस्तद्रूपं पुनराप्तवान् ।। २३ ।।
महर्षिके इस प्रकार शाप देते ही वह मुनिजनद्रोही दुष्टात्मा नीच और मूर्ख शरभ फिर कुत्तेके रूपमें परिणत हो गया ।। २३ ।।