भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 777

जाता है ।। ६ ।। कुलीनं शिक्षितं प्राज्ञं ज्ञानविज्ञानपारगम् । सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञं सहिष्णुं देशजं तथा ॥ ७ ॥ कृतज्ञं बलवन्तं च क्षान्तं दान्तं जितेन्द्रियम् । अलुब्धं लब्धसंतुष्टं स्वामिमित्रबुभूषकम् ॥ ८ ॥ सचिवं देशकालज्ञं सत्त्वसंग्रहणे रतम् । सततं युक्तमनसं हितैषिणमतन्द्रितम् ॥ ९ ॥ युक्तचारं स्वविषये संधिविग्रहकोविदम् । राज्ञस्त्रिवर्गवेत्तारं पौरजानपदप्रियम् ॥ १० ॥ खातकव्यूहतत्त्वज्ञं बलहर्षणकोविदम् । इङ्गिताकारतत्त्वज्ञं यात्राज्ञानविशारदम् ॥ ११ ॥ हस्तिशिक्षासु तत्त्वज्ञमहंकारविवर्जितम् । प्रगल्भं दक्षिणं दान्तं बलिनं युक्तकारिणम् ॥ १२ ॥ चौक्षं चौक्षजनाकीर्णं सुमुखं सुखदर्शनम् । नायकं नीतिकुशलं गुणचेष्टासमन्वितम् ॥ १३ ॥ अस्तब्धं प्रश्रितं श्लक्ष्णं मृदुवादिनमेव च । धीरं शूरं महर्द्धिं च देशकालोपपादकम् ॥ १४ ॥

अतः राजा उसीको मन्त्री बनावे, जो कुलीन, सुशिक्षित, विद्वान्, ज्ञान-विज्ञानमें पारंगत, सब शास्त्रोंका तत्त्व जाननेवाला, सहनशील, अपने देशका निवासी, कृतज्ञ, बलवान्, क्षमाशील, मनका दमन करनेवाला, जितेन्द्रिय, निर्लोभ, जो मिल जाय उसीसे संतोष करनेवाला, स्वामी और उसके मित्रकी उन्नति चाहनेवाला, देश-कालका ज्ञाता, आवश्यक वस्तुओंके संग्रहमें तत्पर, सदा मनको वशमें रखनेवाला, स्वामीका हितैषी, आलस्य-रहित, अपने राज्यमें गुप्तचर लगाये रखनेवाला, संधि और विग्रहके अवसरको समझनेमें कुशल, राजाके धर्म, अर्थ और कामकी उन्नतिका उपाय जाननेवाला, नगर और ग्रामवासी लोगोंका प्रिय, खाईं और सुरंग खुदवाने तथा व्यूह निर्माण करानेकी कलामें कुशल, अपनी सेनाका उत्साह बढ़ानेमें प्रवीण, शक्ल-सूरत और चेष्टा देखकर ही मनके यथार्थ भावको समझ लेनेवाला, शत्रुओंपर चढ़ाई करनेके अवसरको समझनेमें विशेष चतुर, हाथीकी शिक्षाके यथार्थ तत्त्वको जाननेवाला, अहंकाररहित, निर्भीक, उदार, संयमी, बलवान्, उचित कार्य करनेवाला, शुद्ध, शुद्ध पुरुषोंसे युक्त, प्रसन्नमुख, प्रियदर्शन, नेता, नीतिकुशल, श्रेष्ठ गुण और उत्तम चेष्टाओंसे सम्पन्न उद्धण्डतारहित, विनयशील, स्नेही, मृदुभाषी, धीर, शूरवीर, महान् ऐश्वर्यसे सम्पन्न तथा देश और कालके अनुसार कार्य करनेवाला हो ॥ ७—१४ ॥

सचिवं यः प्रकुरुते न चैनमवमन्यते ।