भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

सेवकोंको उनके योग्य स्थानपर नियुक्त करने, कुलीन और सत्पुरुषोंका संग्रह करने, कोष बढ़ाने तथा सबकी देखभाल करनेके लिये राजाको प्रेरणा

भीष्म उवाच

एवं गुणयुतान् भृत्यान् स्वे स्वे स्थाने नराधिपः । नियोजयति कृत्येषु स राज्यफलमश्नुते ॥ १ ॥ भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! इस प्रकार जो राजा गुणवान् भृत्योंको अपने-अपने स्थानपर रखते हुए कार्योंमें लगाता है, वह राज्यके यथार्थ फलका भागी होता है ॥ १ ॥

न श्वा स्वं स्थानमुत्क्रम्य प्रमाणमभिसत्कृतः । आरोप्यः श्वा स्वकात्स्थानादुत्क्रम्यान्यत् प्रमाद्यति ॥ २ ॥ पहले कहे हुए इतिहाससे यह सिद्ध होता है कि कुत्ता अपने स्थानको छोड़कर ऊँचे चढ़ जाय तो न वह विश्वासके योग्य रह जाता है और न कभी उसका सत्कार ही होता है। कुत्तेको उसकी जगहसे उठाकर ऊँचे कदापि न बिठावे; क्योंकि वह दूसरे किसी ऊँचे स्थानपर चढ़कर प्रमाद करने लगता है (इसी प्रकार किसी हीन कुलके मनुष्यको उसकी योग्यता और मर्यादासे ऊँचा स्थान मिल जाय तो वह अहंकारवश उच्छृंखल हो जाता है) ॥ २ ॥

स्वजातिगुणसम्पन्नाः स्वेषु कर्मसु संस्थिताः । प्रकर्तव्या ह्यमात्यास्तु नास्थाने प्रक्रिया क्षमा ॥ ३ ॥ जो अपनी जातिके गुणसे सम्पन्न हो अपने वर्णोचित कर्मोंमें ही लगे रहते हों, उन्हें मन्त्री बनाना चाहिये; किंतु किसीको भी उसकी योग्यतासे बाहरके कार्यमें नियुक्त करना उचित नहीं है ॥ ३ ॥

अनुरूपाणि कर्माणि भृत्येभ्यो यः प्रयच्छति । स भृत्यगुणसम्पन्नो राजा फलमुपाश्नुते ॥ ४ ॥ जो राजा अपने सेवकोंको उनकी योग्यताके अनुरूप कार्य सौंपता है, वह भृत्यके गुणोंसे सम्पन्न हो उत्तम फलका भागी होता है ॥ ४ ॥

शरभः शरभस्थाने सिंहः सिंह इवोर्जितः । व्याघ्रो व्याघ्र इव स्थाप्यो द्वीपी द्वीपी यथा तथा ॥ ५ ॥ शरभको शरभकी जगह, बलवान् सिंहको सिंहके स्थानमें, बाघको बाघकी जगह तथा चीतेको चीतेके स्थानपर नियुक्त करना चाहिये (तात्पर्य यह कि चारों वर्णोंके लोगोंको