भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 788

आत्मवृद्धिकरीं नीतिं विदधीत विचक्षणः ॥ १७ ॥
इसी प्रकार बुद्धिमान् राजा अपने स्थानकी रक्षा करनेवाले मोरके समान अपने राज्यका भलीभाँति पालन करे तथा उसी नीतिका आश्रय ले, जो अपनी उन्नतिमें सहायक हो ॥ १७ ॥

आत्मसंयमनं बुद्ध्या परबुद्ध्यावधारणम् ।
बुद्ध्या चात्मगुणप्राप्तिरेतच्छास्त्रनिदर्शनम् ॥ १८ ॥
केवल अपनी बुद्धिसे मनको वशमें किया जाता है। मन्त्री आदि दूसरोंकी बुद्धिके सहयोगसे कर्तव्यका निश्चय किया जाता है और शास्त्रीय बुद्धिसे आत्मगुणकी प्राप्ति होती है। यही शास्त्रका प्रयोजन है ॥ १८ ॥

परं विश्वासयेत् साम्ना स्वशक्तिं चोपलक्षयेत् ।
आत्मनः परिमर्शेन बुद्धिं बुद्ध्या विचारयेत् ॥ १९ ॥
राजा मधुर वाणीद्वारा समझा-बुझाकर अपने प्रति दूसरेका विश्वास उत्पन्न करे। अपनी शक्तिका भी प्रदर्शन करे तथा अपने विचार और बुद्धिसे कर्तव्यका निश्चय करे ॥ १९ ॥

सान्त्वयोगमतिः प्राज्ञः कार्याकार्यप्रयोजकः ।
निगूढबुद्धेर्धीरस्य वक्तव्ये वा कृतं तथा ॥ २० ॥
राजामें सबको समझा-बुझाकर युक्तिसे काम निकालनेकी बुद्धि होनी चाहिये। वह विद्वान् होनेके साथ ही लोगोंको कर्तव्यकी प्रेरणा दे और अकर्तव्यकी ओर जानेसे रोके अथवा जिसकी बुद्धि गूढ़ या गम्भीर है, उस धीर पुरुषको उपदेश देनेकी आवश्यकता ही क्या है? ॥ २० ॥

स निकृष्टां कथां प्राज्ञो यदि बुद्ध्या बृहस्पतिः ।
स्वभावमेष्यते तप्तं कृष्णायसमिवोदके ॥ २१ ॥
वह बुद्धिमान् राजा बुद्धिमें बृहस्पतिके समान होकर भी किसी कारणवश यदि निम्न श्रेणीकी बात कह डाले तो उसे चाहिये कि जैसे तपाया हुआ लोहा पानीमें डालनेसे शान्त हो जाता है, उसी तरह अपने शान्त स्वभावको स्वीकार कर ले ॥ २१ ॥

अनुयुञ्जीत कृत्यानि सर्वाण्येव महीपतिः ।
आगमैरुपदिष्टानि स्वस्य चैव परस्य च ॥ २२ ॥
राजा अपने तथा दूसरेको भी शास्त्रमें बताये हुए समस्त कर्मोंमें ही लगावे ॥ २२ ॥

मृदुशीलं तथा प्राज्ञं शूरं चार्थविधानवित् ।
स्वकर्मणि नियुञ्जीत ये चान्ये च बलाधिकाः ॥ २३ ॥
कार्यसाधनके उपायको जाननेवाला राजा अपने कार्योंमें कोमल-स्वभाव, विद्वान् तथा शूरवीर मनुष्यको तथा अन्य जो अधिक बलशाली व्यक्ति हों, उनको नियुक्त करे ॥ २३ ॥

अथ दृष्ट्वा नियुक्तानि स्वानुरूपेषु कर्मसु ।
सर्वांस्ताननुवर्तेत स्वरांस्तन्त्रीरिवायता ॥ २४ ॥