महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 789, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंजैसे वीणाके विस्तृत तार सातों स्वरोंका अनुसरण करते हैं, उसी प्रकार राजा अपने कर्मचारियोंको योग्यता-नुसार कर्मोंमें संलग्न देख उन सबके अनुकूल व्यवहार करे ॥ २४ ॥
धर्माणामविरोधेन सर्वेषां प्रियमाचरेत् ।
ममायमिति राजा यः स पर्वत इवाचलः ॥ २५ ॥
राजाको चाहिये कि सबका प्रिय करे, किंतु धर्ममें बाधा न आने दे। प्रजागणको 'यह मेरा ही प्रियगण है' ऐसा समझनेवाला राजा पर्वतके समान अविचल बना रहता है ॥ २५ ॥
व्यवसायं समाधाय सूर्यो रश्मीनिवायतान् ।
धर्ममेवाभिरक्षेत् कृत्वा तुल्ये प्रियाप्रिये ॥ २६ ॥
जैसे सूर्य अपनी विस्तृत किरणोंका आश्रय ले सबकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार राजा प्रिय और अप्रियको समान समझकर सुदृढ़ उद्योगका अवलम्बन करके धर्मकी ही रक्षा करे ॥ २६ ॥
कुलप्रकृतिदेशानां धर्मज्ञान् मृदुभाषिणः ।
मध्ये वयसि निर्दोषान् हिते युक्तानविकलवान् ॥ २७ ॥
अलुब्धान् शिक्षितान् दान्तान् धर्मेषु परिनिष्ठितान् ।
स्थापयेत् सर्वकार्येषु राजा धर्मार्थरक्षिणः ॥ २८ ॥
जो लोग कुल, स्वभाव और देशके धर्मको जानते हों, मधुरभाषी हों, युवावस्थामें जिनका जीवन निष्कलंक रहा हो, जो हितसाधनमें तत्पर और घबराहटसे रहित हों, जिनमें लोभका अभाव हो, जो शिक्षित, जितेन्द्रिय, धर्मनिष्ठ तथा धर्म एवं अर्थकी रक्षा करनेवाले हों, उन्हींको राजा अपने समस्त कार्योंमें लगावे ॥ २७-२८ ॥
एतेन च प्रकारेण कृत्यानामागतिं गतिम् ।
युक्तः समनुतिष्ठेत तुष्टश्चारैरुपस्कृतः ॥ २९ ॥
इस प्रकार राजा सदा सावधान रहकर राज्यके प्रत्येक कार्यका आरम्भ और समाप्ति करे। मनमें संतोष रखे और गुप्तचरोंकी सहायतासे राष्ट्रकी सारी बातें जानता रहे ॥ २९ ॥
अमोघक्रोधहर्षस्य स्वयं कृत्यान्ववेक्षितुः ।
आत्मप्रत्ययकोशस्य वसुदैव वसुन्धरा ॥ ३० ॥
जिसका हर्ष और क्रोध कभी निष्फल नहीं होता, जो स्वयं ही सारे कार्योंकी देखभाल करता है तथा आत्म-विश्वास ही जिसका खजाना है, उस राजाके लिये यह वसुन्धरा (पृथ्वी) ही धन देनेवाली बन जाती है ॥ ३० ॥
व्यक्तश्चानुग्रहो यस्य यथार्थश्चापि निग्रहः ।
गुप्तात्मा गुप्तराष्ट्रश्च स राजा राजधर्मवित् ॥ ३१ ॥