महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराजन्! मैं आशाको वृक्षसहित पर्वतसे भी बहुत बड़ी मानता हूँ अथवा वह आकाशसे भी बढ़कर अप्रमेय है ।। एषा चैव कुरुश्रेष्ठ दुर्विचिन्त्या सुदुर्लभा । दुर्लभत्वाच्च पश्यामि किमन्यद् दुर्लभं ततः ।। ७ ।। कुरुश्रेष्ठ! वह अचिन्त्य और परम दुर्लभ है—उसे जीतना कठिन है। उसके दुर्लभ या दुर्जय होनेके कारण ही मैं उसे इतनी बड़ी देखता और समझता हूँ। भला, आशासे बढ़कर दुर्लभ और क्या है? ।। ७ ।।
भीष्म उवाच
अत्र ते वर्तयिष्यामि युधिष्ठिर निबोध तत् । इतिहासं सुमित्रस्य निर्वृत्तमृषभस्य च ।। ८ ।। भीष्मजीने कहा—युधिष्ठिर! इस विषयमें मैं राजा सुमित्र तथा ऋषभ मुनिका पूर्वघटित इतिहास तुम्हें बताऊँगा। उसे ध्यान देकर सुनो ।। ८ ।। सुमित्रो नाम राजर्षिर्हैहयो मृगयां गतः । ससार स मृगं विद्ध्वा बाणेनानतपर्वणा ।। ९ ।। राजर्षि सुमित्र हैहयवंशी राजा थे। एक दिन वे शिकार खेलनेके लिये वनमें गये। वहाँ उन्होंने झुकी हुई गाँठवाले बाणसे एक मृगको घायल करके उसका पीछा करना आरम्भ किया ।। ९ ।। स मृगो बाणमादाय ययावमितविक्रमः । स च राजा बलात् तूर्णं ससार मृगयूथपम् ।। १० ।। वह मृग बहुत तेज दौड़नेवाला था। वह राजाका बाण लिये-दिये भाग निकला। राजाने भी बलपूर्वक मृगोंके उस यूथपतिका तुरंत पीछा किया ।। १० ।। ततो निम्नं स्थलं चैव स मृगोऽद्रवदाशुगः । मुहूर्तमिव राजेन्द्र समेन स पथागमत् ।। ११ ।। राजेन्द्र! शीघ्रतापूर्वक भागनेवाला वह मृग वहाँसे नीची भूमिकी ओर दौड़ा। फिर दो ही घड़ीमें वह समतल मार्गसे भागने लगा ।। ११ ।। ततः स राजा तारुण्यादौरसेन बलेन च । ससार बाणासनभृत् सखड्गोऽसौ तनुत्रवान् ।। १२ ।। राजा भी नौजवान और हार्दिक बलसे सम्पन्न थे, उन्होंने कवच बाँध रखा था। वे धनुष-बाण और तलवार लिये उसका पीछा करने लगे ।। १२ ।। ततो नदान् नदींश्चैव पल्वलानि वनानि च । अतिक्रम्याभ्यतिक्रम्य ससारैको वनेचरः ।। १३ ।।