महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 880, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंतस्माद् विश्वसितव्यं च विग्रहं च समाचरेत् । देशं कालं च विज्ञाय कार्याकार्यविनिश्चये ॥ १४ ॥ अतः देश-कालको समझकर कर्तव्य-अकर्तव्यका निश्चय करके किसीपर विश्वास और किसीके साथ युद्ध करना चाहिये ॥ १४ ॥
संधातव्यं बुधैर्नित्यं व्यवस्य च हितार्थिभिः । अमित्रैरपि संधेयं प्राणा रक्ष्या हि भारत ॥ १५ ॥ भारत! कर्तव्यका विचार करके सदा हित चाहनेवाले विद्वान् मित्रोंके साथ संधि करनी चाहिये और आवश्यकता पड़नेपर शत्रुओंसे भी संधि कर लेनी चाहिये; क्योंकि प्राणोंकी रक्षा सदा ही कर्तव्य है ॥ १५ ॥
यो ह्यमित्रैर्नरो नित्यं न संदध्यादपण्डितः । न सोऽर्थं प्राप्नुयात् किंचित् फलान्यपि च भारत ॥ १६ ॥ भारत! जो मूर्ख मानव शत्रुओंके साथ कभी किसी भी दशामें संधि ही नहीं करता, वह अपने किसी भी उद्देश्यको सिद्ध नहीं कर सकता और न कोई फल ही पा सकता है ॥ १६ ॥
यस्त्वमित्रेण संदध्यानमित्रेण च विरुद्ध्यते । अर्थयुक्तिं समालोक्य सुमहद् विन्दते फलम् ॥ १७ ॥ जो स्वार्थसिद्धिका अवसर देखकर शत्रुसे तो संधि कर लेता है और मित्रोंके साथ विरोध बढ़ा लेता है, वह महान् फल प्राप्त कर लेता है ॥ १७ ॥
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । मार्जारस्य च संवादं न्यग्रोधे मूषिकस्य च ॥ १८ ॥ इस विषयमें विद्वान् पुरुष वटवृक्षके आश्रयमें रहनेवाले एक बिलाव और चूहेके संवादरूप एक प्रचीन कथानकका दृष्टान्त दिया करते हैं ॥ १८ ॥
वने महति कस्मिंश्चिन्न्यग्रोधः सुमहानभूत् । लताजालपरिच्छिन्नो नानाद्विजगणान्वितः ॥ १९ ॥ किसी महान् वनमें एक विशाल बरगदका वृक्ष था, जो लतासमूहोंसे आच्छादित तथा भाँति-भाँतिके पक्षियोंसे सुशोभित था ॥ १९ ॥
स्कन्धवान् मेघसङ्काशः शीतच्छायो मनोरमः । अरण्यमभितो जातः स तु व्यालमृगाकुलः ॥ २० ॥ वह अपनी मोटी-मोटी डालियोंसे हरा-भरा होनेके कारण मेघके समान दिखायी देता था। उसकी छाया शीतल थी। वह मनोरम वृक्ष वनके समीप होनेके कारण बहुत-से सर्पों तथा पशुओंका आश्रय बना हुआ था ॥ २० ॥
तस्य मूलं समाश्रित्य कृत्वा शतमुखं बिलम् । वसति स्म महाप्राज्ञः पलितो नाम मूषिकः ॥ २१ ॥