महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 882, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंअपश्यदपरं घोरमात्मनः शत्रुमागतम् । शरप्रसूनसङ्काशं महीविवरशायिनम् ॥ ३० ॥ फिर तो उसने एक दूसरे भयंकर शत्रुको वहाँ आया हुआ देखा, जो सरकण्डेके फूलके समान भूरे रंगका था। वह धरतीमें विवर बनाकर उसके भीतर सोया करता था ॥ ३० ॥
नकुलं हरिणं नाम चपलं ताम्रलोचनम् । तेन मूषिकगन्धेन त्वरमाणमुपागतम् ॥ ३१ ॥ वह जातिका न्यौला था। उसकी आँखें ताँबेके समान दिखायी देती थीं। वह चपल नेवला हरिणके नामसे प्रसिद्ध था और उसी चूहेकी गन्ध पाकर बड़ी उतावलीके साथ वहाँ आ पहुँचा था ॥ ३१ ॥
भक्ष्यार्थं संलिहानं तं भूमावूर्ध्वमुखं स्थितम् । शाखागतमरिं चान्यमपश्यत् कोटरालयम् ॥ ३२ ॥ उलूकं चन्द्रकं नाम तीक्ष्णतुण्डं क्षपाचरम् । इधर तो वह नेवला अपना आहार ग्रहण करनेके लिये जीभ लपलपाता हुआ ऊपर मुँह किये पृथ्वीपर खड़ा था और दूसरी ओर बरगदकी शाखापर बैठा हुआ दूसरा ही शत्रु दिखायी दिया, जो वृक्षके खोंखलेमें निवास करता था। वह चन्द्रक नामसे प्रसिद्ध उल्लू था। उसकी चोंच बड़ी तीखी थी। वह रातमें विचरनेवाला पक्षी था ॥ ३२ १/२ ॥
गतस्य विषयं तत्र नकुलोलूकयोस्तथा ॥ ३३ ॥ अथास्यासीदियं चिन्ता तत् प्राप्य सुमहद् भयम् । न्यौले और उल्लू—दोनोंका लक्ष्य बने हुए उस चूहेको बड़ा भय हुआ। अब उसे इस प्रकार चिन्ता होने लगी— ॥
आपद्यस्यां सुकष्टायां मरणे प्रत्युपस्थिते ॥ ३४ ॥ समन्ताद् भय उत्पन्ने कथं कार्यं हितैषिणा । ‘अहो! इस कष्टदायिनी विपत्तिमें मृत्यु निकट आकर खड़ी है। चारों ओरसे भय उत्पन्न हो गया है। ऐसी अवस्थामें अपना हित चाहनेवाले प्राणीको किस उपायका अवलम्बन करना चाहिये?’ ॥ ३४ १/२ ॥
स तथा सर्वतो रुद्धः सर्वत्र भयदर्शनः ॥ ३५ ॥ अभवद् भयसंतप्तश्चक्रे च परमां मतिम् । इस प्रकार सब ओरसे उसका मार्ग अवरुद्ध हो गया था। सर्वत्र उसे भय-ही-भय दिखायी देता था। उस भयसे वह संतप्त हो उठा। इसके बाद उसने पुनः श्रेष्ठ बुद्धिका आश्रय ले सोचना आरम्भ किया— ॥ ३५ १/२ ॥
आपद्धिनाशभूयिष्ठं गर्तः कार्यं हि जीवितम् ॥ ३६ ॥ समन्तात् संशयात् सैषा तस्मादापदुपस्थिता ।