महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 886, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंकालातीतमहिथं तु न प्रशंसन्ति पण्डिताः ॥ ६० ॥ 'अतः हमलोगोंमें सदा प्रेम बढ़े तथा नित्य प्रति हमारी संगति बनी रहे। जब कार्यका समय बीत जाता है, उसके बाद विद्वान् पुरुष उसकी प्रशंसा नहीं करते हैं ॥ ६० ॥
अर्थयुक्तिमिमां तत्र यथाभूतां निशामय । तव जीवितमिच्छामि त्वं ममेच्छसि जीवितम् ॥ ६१ ॥ 'बिलाव! हम दोनोंके प्रयोजनका जो यह संयोग आ बना है, उसे यथार्थरूपसे सुनो। मैं तुम्हारे जीवनकी रक्षा चाहता हूँ और तुम मेरे जीवनकी रक्षा चाहते हो ॥ ६१ ॥
कश्चित् तरति काष्ठेन सुगम्भीरां महानदीम् । स तारयति तत् काष्ठं स च काष्ठेन तार्यते ॥ ६२ ॥ 'कोई पुरुष जब लकड़ीके सहारे किसी गहरी एवं विशाल नदीको पार करता है, तब उस लकड़ीको भी किनारे लगा देता है तथा वह लकड़ी भी उसे तारनेमें सहायक होती है ॥ ६२ ॥
ईदृशो नौ समायोगो भविष्यति सुविस्तरः । अहं त्वां तारयिष्यामि मां च त्वं तारयिष्यसि ॥ ६३ ॥ 'इसी प्रकार हम दोनोंका यह संयोग चिरस्थायी होगा। मैं तुम्हें विपत्तिसे पार कर दूँगा और तुम मुझे आपत्तिसे बचा लोगे' ॥ ६३ ॥
एवमुक्त्वा तु पलितस्तमर्थमुभयोर्हितम् । हेतुमद् ग्रहणीयं च कालापेक्षी न्यवेक्ष्य च ॥ ६४ ॥ इस प्रकार पलित दोनोंके लिये हितकर, युक्तियुक्त और मानने योग्य बात कहकर उत्तर मिलनेके अवसरकी प्रतीक्षा करता हुआ बिलावकी ओर देखने लगा ॥ ६४ ॥
अथ सुव्याहृतं श्रुत्वा तस्य शत्रोर्विचक्षणः । हेतुमद् ग्रहणीयार्थं मार्जारो वाक्यमब्रवीत् ॥ ६५ ॥ अपने उस शत्रुके यह युक्तियुक्त और मान लेने योग्य सुन्दर भाषण सुनकर बुद्धिमान् बिलाव कुछ बोलनेको उद्यत हुआ ॥ ६५ ॥
बुद्धिमान् वाक्यसम्पन्नस्तद्वाक्यमनुवर्णयन् । स्वामवस्थां समीक्ष्याथ साम्नैव प्रत्यपूजयत् ॥ ६६ ॥ उसकी बुद्धि अच्छी थी। वह बोलनेकी कलामें कुशल था। पहले तो उसने चूहेकी बातको मन-ही-मन दुहराया; फिर अपनी दशापर दृष्टिपात करके उसने सामनीतिसे ही उस चूहेकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥ ६६ ॥
ततस्तीक्ष्णाग्रदशनो मणिवैदूर्यलोचनः । मूषिकं मन्दमुद्वीक्ष्य मार्जारो लोमशोऽब्रवीत् ॥ ६७ ॥ तदनन्तर जिसके आगेके दाँत बड़े तीखे थे और दोनों नेत्र नीलमके समान चमक रहे थे, उस लोमश नामक बिलावने चूहेकी ओर किंचिद् दृष्टिपात करके इस प्रकार कहा