भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 993, कुल 2450 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 993

जो प्राचीन श्रेष्ठ पुरुषोंसे विरक्त हो उनके दृष्टिपथसे दूर रहता है तथा उनके द्वारा धिक्कारको प्राप्त होता रहता है, उसे ज्ञानकी उपलब्धि नहीं होती है और ऐसे पुरुष के लिये दूसरे लोग आश्चर्य भी नहीं करते हैं ॥ १२ ॥ विदितं भवतो वीर्यं माहात्म्यं वेद आगमे । कुरुष्वेह यथाशान्ति ब्रह्म शरणमस्तु ते ॥ १३ ॥ तुम्हें ब्राह्मणोंकी शक्तिका ज्ञान है। वेदों और शास्त्रोंमें जो उनकी महिमा उपलब्ध होती है, उसका भी पता है; अतः तुम शान्तिपूर्वक ऐसा प्रयत्न करो, जिससे ब्राह्मणजाति तुम्हें शरण दे सके ॥ १३ ॥ तद् वै पारत्रिकं तात ब्राह्मणानामकुप्यताम् । अथवा तप्यसे पापे धर्ममेवानुपश्य वै ॥ १४ ॥ तात! क्रोधरहित ब्राह्मणोंकी सेवाके लिये जो कुछ किया जाता है वह पारलौकिक लाभका ही हेतु होता है। अथवा यदि तुम्हें पापके लिये पश्चात्ताप होता है तो तुम निरन्तर धर्मपर ही दृष्टि रक्खो ॥ १४ ॥

जनमेजय उवाच अनुतप्ये च पापेन न च धर्मं विलोपये । बुभूषुं भजमानं च प्रीतिमान् भव शौनक ॥ १५ ॥ **जनमेजयने कहा—**शौनक! मुझे अपने पापके कारण बड़ा पश्चात्ताप होता है, अब मैं धर्मका कभी लोप नहीं करूँगा। मुझे कल्याण प्राप्त करनेकी इच्छा है; अतः आप मुझ भक्तपर प्रसन्न होइये ॥ १५ ॥

शौनक उवाच छित्त्वां दम्भं च मानं च प्रीतिमिच्छामि ते नृप । सर्वभूतहितं तिष्ठ धर्मं चैव प्रतिस्मरन् ॥ १६ ॥ **शौनक बोले—**नरेश्वर! मैं तुम्हें तुम्हारे दम्भ और अभिमानका नाश करके तुम्हारा प्रिय करना चाहता हूँ। तुम धर्मका निरन्तर स्मरण रखते हुए समस्त प्राणियोंके हितका साधन करो ॥ १६ ॥ न भयान्न च कार्पण्यान्न लोभात् त्वामुपाह्वये । तां मे दैवीं गिरं सत्यां शृणु त्वं ब्राह्मणैः सह ॥ १७ ॥ राजन्! मैं भयसे, दीनतासे और लोभसे भी तुम्हें अपने पास नहीं बुलाता हूँ। तुम इन ब्राह्मणोंके सहित दैवीवाणीके समान मेरी यह सच्ची बात कान खोलकर सुन लो ॥ १७ ॥ सोऽहं न केनचिच्चार्थी त्वां च धर्मादुपाह्वये । क्रोशतां सर्वभूतानां हाहा धिगिति जल्पताम् ॥ १८ ॥