महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 996, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंयच्चेत् समीक्ष्यैव स्याद् भवेत् तस्मिंस्ततो गुणः ॥ ६ ॥ यदि सारी बातोंपर पूर्वापर विचार न करके कोई कार्य आरम्भ किया जाय तो यही कायरतापूर्ण दोष है और यदि भलीभाँति आलोचना करके कोई कार्य हो तो यही उसमें गुण माना जाता है ॥ ६ ॥
यज्ञो दानं दया वेदाः सत्यं च पृथिवीपते । पञ्चैतानि पवित्राणि षष्ठं सुचरितं तपः ॥ ७ ॥ पृथ्वीनाथ! यज्ञ, दान, दया, वेद, और सत्य—ये पाँचों पवित्र बताये गये हैं। इनके साथ अच्छी तरह आचरणमें लाया हुआ तप भी छठा पवित्र कर्म माना गया है ॥ ७ ॥
तदेव राज्ञां परमं पवित्रं जनमेजय । तेन सम्यग्गृहीतेन श्रेयांसं धर्ममाप्स्यसि ॥ ८ ॥ जनमेजय! राजाओंके लिये ये छहों वस्तुएँ परम पवित्र हैं। इन्हें भलीभाँति आचरणमें लानेपर तुम श्रेष्ठतम धर्मको प्राप्त कर लोगे ॥ ८ ॥
पुण्यदेशाभिगमनं पवित्रं परमं स्मृतम् । अत्राप्युदाहरन्तीमां गाथां गीतां ययातिना ॥ ९ ॥ पुण्य तीर्थोंकी यात्रा करना भी परम पवित्र माना गया है। इस विषयमें विज्ञ पुरुष राजा ययातिकी गायी हुई इस गाथाका उदाहरण दिया करते हैं ॥ ९ ॥
यो मर्त्यः प्रतिपद्येत आयुर्जीवितमात्मनः । यज्ञमेकान्ततः कृत्वा तत् संन्यस्य तपश्चरेत् ॥ १० ॥ जो मनुष्य अपने लिये दीर्घ जीवनकी इच्छा रखता है, वह यत्नपूर्वक यज्ञका अनुष्ठान करके फिर उसे त्यागकर तपस्यामें लग जाय ॥ १० ॥
पुण्यमाहुः कुरुक्षेत्रं कुरुक्षेत्रात् सरस्वतीम् । सरस्वत्याश्च तीर्थानि तीर्थेभ्यश्च पृथूदकम् ॥ ११ ॥ कुरुक्षेत्रको पवित्र तीर्थ बताया गया। कुरुक्षेत्रसे अधिक पवित्र सरस्वती नदी है, उससे भी अधिक पवित्र उसके भिन्न-भिन्न तीर्थ हैं। उन तीर्थोंमें भी दूसरोंकी अपेक्षा पृथूदक तीर्थको श्रेष्ठ कहा गया है ॥ ११ ॥
यत्रावगाह्य पीत्वा च नैनं श्वोमरणं तपेत् । महासरः पुष्कराणि प्रभासोत्तरमानसे ॥ १२ ॥ कालोदकं च गन्तासि लब्धायुर्जीविते पुनः । सरस्वतीदृषद्वत्योः संगमो मानसः सरः ॥ १३ ॥ उसमें स्नान करने और उसका जल पीनेसे मनुष्यको कल ही होनेवाली मृत्युका भय नहीं सताता अर्थात् वह कृतकृत्य हो जाता है। इस कारण मरनेसे नहीं डरता। यदि तुम महासरोवर पुष्कर, प्रभास, उत्तर मानस, कालोदक, दृषद्वती और सरस्वतीके संगम तथा