महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमानसरोवर आदि तीर्थोंमें जाकर स्नान करोगे तो तुम्हें पुनः अपने जीवनके लिये दीर्घायु प्राप्त होगी ।। १२-१३ ।।
स्वाध्यायशीलः स्थानेषु सर्वेषु समुपस्पृशेत् ।
त्यागधर्मः पवित्राणां संन्यासं मनुरब्रवीत् ।। १४ ।।
सभी तीर्थस्थानोंमें स्वाध्यायशील होकर स्नान करे। मनुने कहा है कि सर्वत्यागरूप संन्यास सम्पूर्ण पवित्र धर्मोंमें श्रेष्ठ है ।। १४ ।।
अत्राप्युदाहरन्तीमा गाथाः सत्यवता कृताः ।
यथा कुमारः सत्यो वै नैव पुण्यो न पापकृत् ।। १५ ।।
इस विषयमें भी सत्यवान् द्वारा निर्मित हुई इन गाथाओंका उदाहरण दिया जाता है। जैसे बालक रण-द्वेषसे शून्य होनेके कारण सदा सत्यपरायण ही रहता है। न तो वह पुण्य करता है और न पाप ही। इसी प्रकार प्रत्येक श्रेष्ठ पुरुषको भी होना चाहिये ।। १५ ।।
न ह्यास्ति सर्वभूतेषु दुःखमस्मिन् कुतः सुखम् ।
एवं प्रकृतिभूतानां सर्वसंसर्गयायिनाम् ।। १६ ।।
त्यजतां जीवितं श्रेयो निवृत्ते पुण्यपापके ।
इस संसारके सम्पूर्ण प्राणियोंमें जब दुःख ही नहीं है, तब सुख कहाँसे हो सकता है? यह सुख और दुःख दोनों ही प्रकृतिस्थ प्राणियोंके धर्म हैं, जो कि सब प्रकारके संसर्गदोषको स्वीकार करके उनके अनुसार चलते हैं। जिन्होंने ममता और अहंकार आदिके साथ सब कुछ त्याग दिया है, जिनके पुण्य और पाप सभी निवृत्त हो चुके हैं, ऐसे पुरुषोंका जीवन ही कल्याणमय है ।। १६ ½ ।।
यत्त्वेव राज्ञो ज्यायिष्ठं कार्याणां तद् ब्रवीमि ते ।। १७ ।।
बलेन संविभागैश्च जय स्वर्गं जनेश्वर ।
यस्यैव बलमोजश्च स धर्मस्य प्रभूर्नरः ।। १८ ।।
अब मैं राजाके कार्योंमें जो सबसे श्रेष्ठ है, उसका वर्णन करता हूँ। जनेश्वर! तुम धैर्ययुक्त बल और दानके द्वारा स्वर्गलोकपर विजय प्राप्त करो। जिसके पास बल और ओज है, वही मनुष्य धर्माचरणमें समर्थ होता है ।। १७-१८ ।।
ब्राह्मणानां सुखार्थं हि त्वं पाहि वसुधां नृप ।
यथैवैतान् पुराऽऽक्षैप्सीस्तथैवैतान् प्रसादय ।। १९ ।।
नरेश्वर! तुम ब्राह्मणोंको सुख पहुँचानेके लिये ही सारी पृथ्वीका पालन करो। जैसे पहले इन ब्राह्मणोंपर आक्षेप किया था, वैसे इन सबको अपने सद्बर्तावसे प्रसन्न करो ।। १९ ।।
अपि धिक्क्रियमाणोऽपि त्यज्यमानोऽप्यनेकधा ।
आत्मनो दर्शनाद् विप्रान्न हन्तास्मीति मार्गय ।
घटमानः स्वकार्येषु कुरु निःश्रेयसं परम् ।। २० ।।