महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1007, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः
मद्य और मांसके भक्षणमें महान् दोष, उनके त्यागकी महिमा एवं त्यागमें परम लाभका प्रतिपादन
युधिष्ठिर उवाच
अहिंसा परमो धर्म इत्युक्तं बहुशस्त्वया ।
जातो नः संशयो धर्मे मांसस्य परिवर्जने ।
दोषो भक्षयतः कः स्यात् कश्चाभक्षयतो गुणः ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! आपने बहुत बार यह बात कही है कि अहिंसा परम धर्म है; अतः मांसके परित्यागरूप धर्मके विषयमें मुझे संदेह हो गया है। इसलिये मैं यह जानना चाहता हूँ कि मांस खानेवालेकी क्या हानि होती है और जो मांस नहीं खाता उसे कौन-सा लाभ मिलता है? ॥ १ ॥
हत्वा भक्षयतो वापि परेणोपहृतस्य वा ।
हन्याद् वा यः परस्यार्थे क्रीत्वा वा भक्षयेन्नरः ॥ २ ॥
जो स्वयं पशुका वध करके उसका मांस खाता है या दूसरेके दिये हुए मांसका भक्षण करता है या जो दूसरेके खानेके लिये पशुका वध करता है अथवा जो खरीदकर मांस खाता है, उसको क्या दण्ड मिलता है? ॥ २ ॥
एतदिच्छामि तत्त्वेन कथ्यमानं त्वयानघ ।
निश्चयेन चिकीर्षामि धर्ममेतं सनातनम् ॥ ३ ॥
निष्पाप पितामह! मैं चाहता हूँ कि आप इस विषयका यथार्थरूपसे विवेचन करें। मैं निश्चितरूपसे इस सनातन धर्मके पालनकी इच्छा रखता हूँ ॥ ३ ॥
कथमायुरवाप्नोति कथं भवति सत्त्ववान् ।
कथमव्यंगतामेति लक्षण्यो जायते कथम् ॥ ४ ॥
मनुष्य किस प्रकार आयु प्राप्त करता है, कैसे बलवान् होता है, किस तरह उसे पूर्णंगता प्राप्त होती है और कैसे वह शुभलक्षणोंसे संयुक्त होता है? ॥ ४ ॥
भीष्म उवाच
मांसस्याभक्षणाद् राजन् यो धर्मः कुरुनन्दन ।
तन्मे शृणु यथातत्त्वं यथास्य विधिरुत्तमः ॥ ५ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! कुरुनन्दन! मांस न खानेसे जो धर्म होता है, उसका मुझसे यथार्थ वर्णन सुनो तथा उस धर्मकी जो उत्तम विधि है, वह भी जान लो ।।
रूपमव्यंगतामायुर्बुद्धिं सत्त्वं बलं स्मृतिम् ।