भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1101, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1101

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एकत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः

प्रमथगणोंके द्वारा धर्माधर्मसम्बन्धी रहस्यका कथन

भीष्म उवाच

ततः सर्वे महाभागा देवाश्च पितरश्च ह ।
ऋषयश्च महाभागाः प्रमथान् वाक्यमब्रुवन् ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर सभी महाभाग देवता, पितर तथा महान् भाग्यशाली महर्षि प्रमथगणोंसे बोले— ॥ १ ॥

भवन्तो वै महाभागा अपरोक्षनिशाचराः ।
उच्छिष्टानशुचीन् क्षुद्रान् कथं हिंसथ मानवान् ॥ २ ॥
'महाभागगण! आपलोग प्रत्यक्ष निशाचर हैं। बताइये, अपवित्र, उच्छिष्ट और शूद्र मनुष्योंकी किस तरह और क्यों हिंसा करते हैं? ॥ २ ॥

के च स्मृताः प्रतीघाता येन मर्त्यान् न हिंसथ ।
रक्षोघ्नानि च कानि स्युर्येर्गृहेषु प्रणश्यथ ।
श्रोतुमिच्छाम युष्माकं सर्वमेतन्निशाचराः ॥ ३ ॥
'वे कौन-से प्रतिघात (शत्रुके आघातोंको रोक देनेवाले उपाय) हैं, जिनका आश्रय लेनेसे आपलोग उन मनुष्योंकी हिंसा नहीं करते। वे रक्षोघ्न मन्त्र कौन-से हैं, जिनका उच्चारण करनेसे आपलोग घरमें ही नष्ट हो जायँ या भाग जायँ? निशाचरो! ये सारी बातें हम आपके मुखसे सुनना चाहते हैं' ॥ ३ ॥

प्रमथा ऊचुः

मैथुनेन सदोच्छिष्टाः कृते चैवाधरोत्तरे ।
मोहान्मांसानि खादेत वृक्षमूले च यः स्वपेत् ॥ ४ ॥
आमिषं शीर्षतो यस्य पादतो यश्च संविशेत् ।
तत उच्छिष्टकाः सर्वे बहुच्छिद्राश्च मानवाः ॥ ५ ॥
उदके चाप्यमेध्यानि श्लेष्माणं च प्रमुञ्चति ।
एते भक्ष्याश्च वध्याश्च मानुषा नात्र संशयः ॥ ६ ॥
**प्रमथ बोले—**जो मनुष्य सदा स्त्री-सहवासके कारण दूषित रहते, बड़ोंका अपमान करते, मूर्खतावश मांस खाते, वृक्षकी जड़में सोते, सिरपर मांसका बोझा ढोते, बिछौनोंपर पैर रखनेकी जगह सिर रखकर सोते, वे सब-के-सब मनुष्य उच्छिष्ट (अपवित्र) तथा बहुत-से छिद्रोंवाले माने गये हैं। जो पानीमें मल-मूत्र एवं थूक फेंकते हैं, वे भी उच्छिष्टकी ही