भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1117, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1117

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षट्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः

दान लेने और अनुचित भोजन करनेका प्रायश्चित्त

युधिष्ठिर उवाच

उक्तास्तु भवता भोज्यास्तथाभोज्याश्च सर्वशः ।
अत्र मे प्रश्नसंदेहस्तन्मे वद पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा— पितामह! आपने भोज्यान्न और अभोज्यान्न सभी तरहके मनुष्योंका वर्णन किया; किंतु इस विषयमें मुझे पूछनेयोग्य एक संदेह उत्पन्न हो गया। उसका मेरे लिये समाधान कीजिये ॥ १ ॥

ब्राह्मणानां विशेषेण हव्यकव्यप्रतिग्रहे ।
नानाविधेषु भोज्येषु प्रायश्चित्तानि शंस मे ॥ २ ॥
प्रायः ब्राह्मणोंको ही हव्य और कव्यका प्रतिग्रह लेना पड़ता है और उन्हें ही नाना प्रकारके अन्न ग्रहण करनेका अवसर आता है। ऐसी दशामें उन्हें पाप लगते हैं, उनका क्या प्रायश्चित्त है? यह मुझे बतावें ॥ २ ॥

भीष्म उवाच

हन्त वक्ष्यामि ते राजन् ब्राह्मणानां महात्मनाम् ।
प्रतिग्रहेषु भोज्ये च मुच्यते येन पाप्मनः ॥ ३ ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! महात्मा ब्राह्मणोंको प्रतिग्रह लेने और भोजन करनेके पापसे जिस प्रकार छुटकारा मिलता है, वह प्रायश्चित्त मैं बता रहा हूँ, सुनो ॥ ३ ॥

घृतप्रतिग्रहे चैव सावित्री समिदाहुतिः ।
तिलप्रतिग्रहे चैव सममेतद् युधिष्ठिर ॥ ४ ॥
युधिष्ठिर! ब्राह्मण यदि घीका दान ले तो गायत्री-मन्त्र पढ़कर अग्निमें समिधाकी आहुति दे। तिलका दान लेनेपर भी यही प्रायश्चित्त करना चाहिये। ये दोनों कार्य समान हैं ॥ ४ ॥

मांसप्रतिग्रहे चैव मधुनो लवणस्य च ।
आदित्योदयनं स्थित्वा पूतो भवति ब्राह्मणः ॥ ५ ॥
फलका गूदा, मधु और नमकका दान लेनेपर उस समयसे लेकर सूर्योदयतक खड़े रहनेसे ब्राह्मण शुद्ध हो जाता है ॥ ५ ॥

काञ्चनं प्रतिगृह्याथ जपमानो गुरुश्रुतिम् ।
कृष्णायासं च विवृतं धारयन् मुच्यते द्विजः ॥ ६ ॥