महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1126, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
पाँच प्रकारके दानोंका वर्णन
युधिष्ठिर उवाच
श्रुतं ते भवतस्तात सत्यव्रतपराक्रम ।
दानधर्मेण महता ये प्राप्तास्त्रिदिवं नृपाः ॥ १ ॥
(दूसरे दिन प्रातःकाल) युधिष्ठिरने पूछा—सत्यव्रती और पराक्रमसम्पन्न तात! दानजनित महान् धर्मके प्रभावसे जो-जो नरेश स्वर्गलोकमें गये हैं, उन सबका परिचय मैंने आपके मुखसे सुना है ॥ १ ॥
इमांस्तु श्रोतुमिच्छामि धर्मान् धर्मभृतां वर ।
दानं कतिविधं देयं किं तस्य च फलं लभेत् ॥ २ ॥
धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ पितामह! अब मैं दानके सम्बन्धमें इन धर्मोंको सुनना चाहता हूँ कि दानके कितने भेद हैं? और जो दान दिया जाता है, उसका क्या फल मिलता है? ॥ २ ॥
कथं केभ्यश्च धर्म्यं च दानं दातव्यमिष्यते ।
कैः कारणैः कतिविधं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ ३ ॥
कैसे और किन लोगोंको धर्मके अनुसार दान देना अभीष्ट है? किन कारणोंसे देना चाहिये? और दानके कितने भेद हो जाते हैं? यह सब मैं यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ ॥ ३ ॥
भीष्म उवाच
शृणु तत्त्वेन कौन्तेय दानं प्रति ममानघ ।
यथा दानं प्रदातव्यं सर्ववर्णेषु भारत ॥ ४ ॥
भीष्मजीने कहा—निष्पाप कुन्तीकुमार! भरतनन्दन! दानके सम्बन्धमें मैं यथार्थरूपसे जो कुछ कहता हूँ, सुनो। सभी वर्णोंके लोगोंको दान किस प्रकार करना चाहिये—यह बता रहा हूँ ॥ ४ ॥
धर्मादर्थाद् भयात् कामात् कारुण्यादिति भारत ।
दानं पञ्चविधं ज्ञेयं कारणैर्येर्निबोध तत् ॥ ५ ॥
भारत! धर्म, अर्थ, भय, कामना और दया—इन पाँच हेतुओंसे दानको पाँच प्रकारका जानना चाहिये। अब जिन कारणोंसे दान देना उचित है, उनको सुनो ॥
इह कीर्तिमवाप्नोति प्रेत्य चानुत्तमं सुखम् ।
इति दानं प्रदातव्यं ब्राह्मणेभ्योऽनसूयता ॥ ६ ॥