भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1220, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1220

वह मनको सदा अपने अधीन रखकर स्वजनोंसे, दूसरोंसे, शस्त्रसे, विषसे तथा स्त्री-पुत्रोंसे भी निरन्तर अपनी रक्षा करे ।। सर्वेभ्य एव स्थानेभ्यो रक्षेदात्मानमात्मवान् । प्रजानां रक्षणार्थाय प्रजाहितकरो भवेत् ।। आत्मवान् राजा प्रजाकी रक्षाके लिये सभी स्थानोंसे अपनी रक्षा करे और सदा प्रजाके हितमें संलग्न रहे ।। प्रजाकार्यं तु तत्कार्यं प्रजासौख्यं तु तत्सुखम् । प्रजाप्रियं प्रियं तस्य स्वहितं तु प्रजाहितम् ।। प्रजार्थं तस्य सर्वस्वमात्मार्थं न विधीयते ।। प्रजाका कार्य ही राजाका कार्य है, प्रजाका सुख ही उसका सुख है, प्रजाका प्रिय ही उसका प्रिय है तथा प्रजाके हितमें ही उसका अपना हित होता है। प्रजाके हितके लिये ही उसका सर्वस्व है, अपने लिये कुछ भी नहीं है ।। प्रकृतीनां हि रक्षार्थं रागद्वेषौ व्युदस्य च । उभयोः पक्षयोर्वादं श्रुत्वा चैव यथातथम् ।। तमर्थं विमृशेद् बुद्ध्या स्वयमातत्त्वदर्शनात् ।। प्रकृतियोंकी रक्षाके लिये राग-द्वेष छोड़कर किसी विवादके निर्णयके लिये पहले दोनों पक्षोंकी यथार्थ बातें सुन ले। फिर अपनी बुद्धिके द्वारा स्वयं उस मामलेपर तबतक विचार करे, जबतक कि उसे यथार्थताका सुस्पष्ट ज्ञान न हो जाय ।। तत्त्वविद्भिश्च बहुभिः सहासीनो नरोत्तमैः । कर्तारमपराधं च देशकालौ नयानयौ ।। ज्ञात्वा सम्यग्यथाशास्त्रं ततो दण्डं नयेन्नृषु ।। तत्त्वको जाननेवाले अनेक श्रेष्ठ पुरुषोंके साथ बैठकर परामर्श करनेके बाद अपराधी, अपराध, देश, काल, न्याय और अन्यायका ठीक-ठीक ज्ञान प्राप्त करके फिर शास्त्रके अनुसार राजा अपराधी मनुष्योंको दण्ड दे ।। एवं कुर्वल्लभेद् धर्मं पक्षपातविवर्जनात् ।। प्रत्यक्षाप्तोपदेशाभ्यामनुमानेन वा पुनः । बोद्धव्यं सततं राज्ञा देशवृत्तं शुभाशुभम् ।। पक्षपात छोड़कर ऐसा करनेवाला राजा धर्मका भागी होता है। प्रत्यक्ष देखकर, माननीय पुरुषोंके उपदेश सुनकर अथवा युक्तियुक्त अनुमान करके राजाको सदा ही अपने देशके शुभाशुभ वृत्तान्तको जानना चाहिये ।। चारैः कर्मप्रवृत्त्या च तद् विज्ञाय विचारयेत् । अशुभं निर्हरेत् सद्यो जोषयच्छुभमात्मनः ।।