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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1228, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1228

रोगोंका आक्रमण होता है और न किसी तरहके उपद्रव ही होते हैं। राजाके स्वधर्म-परायण होनेपर वहाँकी सारी प्रजा धर्मशील होती है।। एष्टव्यः सततं देवि युक्ताचारो नराधिपः। छिद्रज्ञश्चैव शत्रूणामप्रमत्तः प्रतापवान् ॥ देवि! प्रजाको सदा ऐसे नरेशकी इच्छा रखनी चाहिये, जो सदाचारी तो हो ही, देशमें सब ओर गुप्तचर नियुक्त करके शत्रुओंके छिद्रोंकी जानकारी रखता हो। सदा ही प्रमादशून्य और प्रतापी हो ।। क्षुद्राः पृथिव्यां बहवो राज्ञां बहुविनाशकाः। तस्मात् प्रमादं सुश्रोणि न कुर्यात् पण्डितो नृपः ॥ सुश्रोणि! पृथ्वीपर बहुत-से ऐसे क्षुद्र मनुष्य हैं, जो राजाओंका महान् विनाश करनेपर तुले रहते हैं; अतः विद्वान् राजाको कभी प्रमाद नहीं करना चाहिये (आत्मरक्षाके लिये सदा सावधान रहना चाहिये)।। तेषु मित्रेषु त्यक्तेषु तथा मर्त्येषु हस्तिषु। विस्रम्भो नोपगन्तव्यः स्नानपानेषु नित्यशः ॥ पहलेके छोड़े हुए मित्रोंपर, अन्यान्य मनुष्योंपर, हाथियोंपर कभी विश्वास नहीं करना चाहिये। प्रतिदिनके स्नान और खानपानमें भी किसीका पूर्णतः विश्वास करना उचित नहीं है।। राज्ञो वल्लभतामेति कुलं भावयते स्वकम् । यस्तु राष्ट्रहितार्थाय गोब्राह्मणकृते तथा ॥ बन्दीग्रहाय मित्रार्थे प्राणांस्त्यजति दुस्त्यजान् ॥ जो राष्ट्रके हितके लिये, गौ और ब्राह्मणोंके उपकारके लिये, किसीको बन्धनसे मुक्त करनेके लिये और मित्रोंकी सहायताके निमित्त अपने दुस्त्यज प्राणोंका परित्याग कर देता है, वह राजाको प्रिय होता है और अपने कुलको उन्नतिके शिखरपर पहुँचा देता है ।। सर्वकामदुघां धेनुं धरणीं लोकधारिणीम् । समुद्रान्तां वरारोहे सशैलवनकाननाम् ॥ दद्याद् देवि द्विजातिभ्यो वसुपूर्णां वसुन्धराम् ॥ न तत्समं वरारोहे प्राणत्यागी विशिष्यते ॥ वरारोहे! यदि कोई सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाली कामधेनुको तथा पर्वत और वनोंसहित समुद्रपर्यन्त लोकधारिणी पृथ्वीको धनसे परिपूर्ण करके द्विजोंको दान कर देता है, उसका वह दान भी पूर्वोक्त प्राणत्यागी योद्धाके त्यागके समान नहीं है। वह प्राण-त्यागी ही उस दातासे बढ़कर है।। सहस्रमपि यज्ञानां यजते च धनर्द्धिमान् । यज्ञैस्तस्य किमाश्चर्यं प्राणत्यागः सुदुष्करः ॥

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