भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1229, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1229

जिसके पास धन और सम्पत्ति है, वह सहस्रों यज्ञ कर सकता है। उसके उन यज्ञोंसे कौन-सी आश्चर्यकी बात हो गयी! प्राणोंका परित्याग करना तो सभीके लिये अत्यन्त दुष्कर है ।।

तस्मात् सर्वेषु यज्ञेषु प्राणयज्ञो विशिष्यते ।
एवं संग्रामयज्ञास्ते यथार्थं समुदाहृताः ।।

अतः सम्पूर्ण यज्ञोंमें प्राणयज्ञ ही बढ़कर है। देवि! इस प्रकार मैंने तुम्हारे समक्ष रणयज्ञका यथार्थरूपसे वर्णन किया है ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)