महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1230, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें[संक्षेपसे राजधर्मका वर्णन]
श्रीमहेश्वर उवाच
सम्प्रहासश्च भृत्येषु न कर्तव्यो नराधिपैः ।
लघुत्वं चैव प्राप्नोति आज्ञा चास्य निवर्तते ॥
श्रीमहादेवजी कहते हैं— देवि! राजाओंको अपने सेवकोंके साथ हास-परिहास नहीं करना चाहिये; क्योंकि ऐसा करनेसे उन्हें लघुता प्राप्त होती है और उनकी आज्ञाका पालन नहीं किया जाता है ॥
भृत्यानां सम्प्रहासेन पार्थिवः परिभूयते ।
अयाच्यानि च याचन्ति अवक्तव्यं ब्रुवन्ति च ॥
सेवकोंके साथ हँसी-परिहास करनेसे राजाका तिरस्कार होता है। वे धृष्ट सेवक न माँगने योग्य वस्तुओंको भी माँग बैठते हैं और न कहने योग्य बातें भी कह डालते हैं ॥
पूर्वमप्युचितैर्लाभैः परितोषं न यान्ति ते ।
तस्माद् भृत्येषु नृपतिः सम्प्रहासं विवर्जयेत् ॥
पहलेसे ही उचित लाभ मिलनेपर भी वे संतुष्ट नहीं होते; इसलिये राजा सेवकोंके साथ हँसी-मजाक करना छोड़ दे ॥
न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते न च विश्वसेत् ।
सगोत्रेषु विशेषेण सर्वोपायैर्न विश्वसेत् ॥
राजा अविश्वस्त पुरुषपर कभी विश्वास न करे। जो विश्वस्त हो, उसपर भी पूरा विश्वास न करे; विशेषतः अपने समान गोत्रवाले भाई-बन्धुओंपर किसी भी उपायसे कदापि विश्वास न करे ॥
विश्वासाद् भयमुत्पन्नं हन्याद् वृक्षमिवाशनिः ।
प्रमादाद्धन्यते राजा लोभेन च वशीकृतः ॥
तस्मात् प्रमादं लोभं च न च कुर्यान्न विश्वसेत् ॥
जैसे वज्र वृक्षको नष्ट कर देता है, उसी प्रकार विश्वाससे उत्पन्न हुआ भय राजाको नष्ट कर डालता है। प्रमादवश लोभके वशीभूत हुआ राजा मारा जाता है। अतः प्रमाद और लोभको अपने भीतर न आने दे तथा किसीपर भी विश्वास न करे ॥
भयार्तानां भयात् त्राता दीनानुग्रहकारणात् ।
कार्याकार्यविशेषज्ञो नित्यं राष्ट्रहिते रतः ॥
राजा भयातुर मनुष्योंकी भयसे रक्षा करे, दीन-दुःखियोंपर अनुग्रह करे, कर्तव्य और अकर्तव्यको विशेषरूपसे समझे और सदा राष्ट्रके हितमें संलग्न रहे ॥
सत्यः संधस्थितो राज्ये प्रजापालनतत्परः ।
अलुब्धो न्यायवादी च षड्भागमुपजीवति ॥