महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1258, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंकुछ लोगोंके उदरमें तीखे शूल-से उठते हैं, जिनसे वे बहुत पीड़ित होते और दुःखमें डूब जाते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये॥
श्रीमहेश्वर उवाच
ये पुरा मनुजा देवि कामक्रोधवशा भृशम् ।
आत्मार्थमेव चाहारं भुञ्जन्ते निरपेक्षकाः ॥
अभक्ष्याहारदानैश्च विश्वस्तानां विषप्रदाः ।
अभक्ष्यभक्षदाश्चैव शौचमङ्गवर्जिताः ॥
एवंयुक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि शोभने ।
कथंचित् प्राप्य मानुष्यं तत्र ते व्याधिपीडिताः ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! पहले जो मनुष्य काम और क्रोधके अत्यन्त वशीभूत हो दूसरोंकी परवा न करके केवल अपने ही लिये आहार जुटाते और खाते हैं, अभक्ष्य भोजनका दान करते हैं, विश्वस्त मनुष्योंको जहर दे देते हैं, न खानेयोग्य वस्तुएँ खिला देते हैं, शौच और मंगलाचारसे रहित होते हैं; शोभने! ऐसे आचरणवाले लोग पुनर्जन्म लेनेपर किसी तरह मानव-शरीरको पाकर उन्हीं रोगोंसे पीड़ित होते हैं॥
तैस्तैर्बहुविधाकारैर्व्याधिभिर्दुःखसंश्रिताः ।
भवन्त्येव तथा देवि यथा चैव कृतं पुरा ॥
देवि! नाना प्रकारके रूपवाले उन रोगोंसे पीड़ित हो वे दुःखमें निमग्न हो जाते हैं। पूर्वजन्ममें जैसा किया था वैसा भोगते हैं॥
उमोवाच
दृश्यन्ते सततं देव व्याधिभिर्मेहनाश्रितैः ।
पीड्यमानास्तथा मर्त्या अश्मरीशर्करादिभिः ॥
केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
उमाने पूछा— देव! बहुत-से मनुष्य प्रमेहसम्बन्धी रोगोंसे पीड़ित देखे जाते हैं, कितने ही पथरी और शर्करा (पेशाबसे चीनी आना) आदि रोगोंके शिकार हो जाते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें॥
श्रीमहेश्वर उवाच
ये पुरा मनुजा देवि परदारप्रधर्षकाः ।
तिर्यग्योनिषु धूर्ता वै मैथुनार्थं चरन्ति च ॥
कामदोषेण ये धूर्ताः कन्यासु विधवासु च ।
बलात्कारेण गच्छन्ति रूपदर्पसमन्विताः ॥
तादृशा मरणं प्राप्ताः पुनर्जन्मनि शोभने ।