महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1524, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंये सम्पूर्ण लोकोंको उनकी अभीष्ट वस्तु देनेवाले हैं। यह महान् विश्व उन्हींका स्वरूप बताया गया है। ब्राह्मण और ऋषि उन्हें सबसे ज्येष्ठ कहते हैं ॥ २४ ॥ प्रथमो ह्येष देवानां मुखादग्निमजीजनत् । ग्रहैर्बहुविधैः प्राणान् संरुद्धानुत्सृजत्यपि ॥ २५ ॥ वे देवताओंमें प्रधान हैं, उन्होंने अपने मुखसे अग्निको उत्पन्न किया है। वे नाना प्रकारकी ग्रह-बाधाओंसे ग्रस्त प्राणियोंको दुःखसे छुटकारा दिलाते हैं ॥ २५ ॥ विमुञ्चति न पुण्यात्मा शरण्यः शरणागतान् । आयुरायोग्यमैश्वर्यं वित्तं कामांश्च पुष्कलान् ॥ २६ ॥ स ददाति मनुष्येभ्यः स एवाक्षिपेते पुनः । पुण्यात्मा और शरणागतवत्सल तो वे इतने हैं कि शरणमें आये हुए किसी प्राणीका त्याग नहीं करते। वे ही मनुष्योंको आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, धन और सम्पूर्ण कामनाएँ प्रदान करते हैं और वे ही पुनः उन्हें छीन लेते हैं ॥ २६ १/२ ॥ शक्रादिषु च देवेषु तस्यैश्वर्यमिहोच्यते ॥ २७ ॥ स एव व्यापृतो नित्यं त्रैलोक्यस्य शुभाशुभे । इन्द्र आदि देवताओंके पास उन्हींका दिया हुआ ऐश्वर्य बताया जाता है। तीनों लोकोंके शुभाशुभ कर्मोंका फल देनेके लिये वे ही सदा तत्पर रहते हैं ॥ २७ १/२ ॥ ऐश्वर्याच्चैव कामानामीश्वरः पुनरुच्यते ॥ २८ ॥ महेश्वरश्च लोकानां महतामीश्वरश्च सः । समस्त कामनाओंके अधीश्वर होनेके कारण उन्हें 'ईश्वर' कहते हैं और महान् लोकोंके ईश्वर होनेके कारण उनका नाम 'महेश्वर' हुआ है ॥ २८ १/२ ॥ बहुभिर्विविधै रूपैर्विश्वं व्याप्तमिदं जगत् । तस्य देवस्य यद् वक्त्रं समुद्रे वडवामुखम् ॥ २९ ॥ उन्होंने नाना प्रकारके बहुसंख्यक रूपोंद्वारा इस सम्पूर्ण लोकको व्याप्त कर रखा है। उन महादेवजीका जो मुख है, वही समुद्रमें वडवानल है ॥ २९ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि महेश्वरमाहात्म्यं नाम एकषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६१ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें महेश्वरमाहात्म्य नामक एक सौ इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६१ ॥