महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1526, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्राणयात्रामनेकां च कल्पमानेन भारत ॥ ७ ॥
तत्परेणैव नान्येन शक्यं ह्येतस्य दर्शनम् ।
किंतु वे बालक हैं। अहंकारवश अपनेको पण्डित मानते हैं। अतः वे जो पूर्वोक्त निश्चय करते हैं, वह असंगत है। (आकाशमें नीलिमा प्रत्यक्ष दिखायी देनेपर ही वह मिथ्या ही है, अतः केवल प्रत्यक्षके बलसे सत्यका निर्णय नहीं किया जा सकता। धर्म, ईश्वर और परलोक आदिके विषयमें शास्त्र-प्रमाण ही श्रेष्ठ है; क्योंकि अन्य प्रमाणोंकी वहाँतक पहुँच नहीं हो सकती) यदि कहो कि एकमात्र ब्रह्म जगत्का कारण कैसे हो सकता है तो इसका उत्तर यह है कि मनुष्य आलस्य छोड़कर दीर्घकालतक योगका अभ्यास करे और तत्त्वका साक्षात्कार करनेके लिये निरन्तर प्रयत्नशील बना रहे। अपने जीवनका अनेक उपायसे निर्वाह करे। इस तरह सदा यत्नशील रहनेवाला पुरुष ही इस तत्त्वका दर्शन कर सकता है, दूसरा कोई नहीं ॥ ६-७ ½ ॥
हेतूनामन्तमासाद्य विपुलं ज्ञानमुत्तमम् ॥ ८ ॥
ज्योतिः सर्वस्य लोकस्य विपुलं प्रतिपद्यते ।
न त्वेव गमनं राजन् हेतुतो गमनं तथा ।
अग्राह्यमनिबद्धं च वाचा सम्परिवर्जयेत् ॥ ९ ॥
जब सारे तर्क समाप्त हो जाते हैं तभी उत्तम ज्ञानकी प्राप्ति होती है। वह ज्ञान ही सम्पूर्ण जगत्के लिये उत्तम ज्योति है। राजन्! कोरे तर्कसे जो ज्ञान होता है, वह वास्तवमें ज्ञान नहीं है; अतः उसको प्रामाणिक नहीं मानना चाहिये। जिसका वेदके द्वारा प्रतिपादन नहीं किया गया हो, उस ज्ञानका परित्याग कर देना ही उचित है ॥ ८-९ ॥
युधिष्ठिर उवाच
प्रत्यक्षं लोकतः सिद्धिर्लोकश्चागमपूर्वकः ।
शिष्टाचारो बहुविधस्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १० ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! प्रत्यक्ष प्रमाण, जो लोकमें प्रसिद्ध है; अनुमान, आगम और भाँति-भाँतिके शिष्टाचार ये बहुत-से प्रमाण उपलब्ध होते हैं। इनमें कौन-सा प्रबल है, यह बतानेकी कृपा कीजिये ॥ १० ॥
भीष्म उवाच
धर्मस्य ह्रियमाणस्य बलवद्भिर्दुरात्मभिः ।
संस्था यत्नेरपि कृता कालेन प्रतिभिद्यते ॥ ११ ॥
**भीष्मजीने कहा—**बेटा! जब बलवान् पुरुष दुराचारी होकर धर्मको हानि पहुँचाने लगते हैं, तब साधारण मनुष्योंद्वारा यत्नपूर्वक की हुई रक्षाकी व्यवस्था भी कुछ समयमें भंग हो जाती है ॥ ११ ॥
अधर्मो धर्मरूपेण तृणैः कूप इवावृतः ।