भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1531, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1531

नान्तरा भोजनं दृष्टमुपवासविधिर्हि सः ॥ ४० ॥ सत्पुरुषको चाहिये कि वह सम्पूर्ण अतिथियों, सेवकों, स्वजनों तथा शरणार्थियोंका रक्षक एवं स्वागत करनेवाला बने। देवताओंने मनुष्योंके लिये सबेरे और सायंकाल दो ही समय भोजन करनेका विधान किया है। बीचमें भोजन करनेकी विधि नहीं देखी जाती। इस नियमका पालन करनेसे उपवासका ही फल होता है ॥ ३९-४० ॥
होमकाले यथा वह्निः कालमेव प्रतीक्षते ।
ऋतुकाले तथा नारी ऋतुमेव प्रतीक्षते ॥ ४१ ॥
जैसे होमकालमें अग्निदेव होमकी ही प्रतीक्षा करते हैं, उसी प्रकार ऋतुकालमें स्त्री ऋतुकी ही प्रतीक्षा करती है ॥ ४१ ॥
नान्यदा गच्छते यस्तु ब्रह्मचर्यं च तत् स्मृतम् ।
अमृतं ब्राह्मणा गाव इत्येतत् त्रयमेकतः ।
तस्माद् गोब्राह्मणं नित्यमर्चयेत यथाविधि ॥ ४२ ॥
जो ऋतुकालके सिवा और कभी स्त्रीके पास नहीं जाता, उसका वह बर्ताव ब्रह्मचर्य कहा गया है। अमृत, ब्राह्मण और गौ—ये तीनों एक स्थानसे प्रकट हुए हैं। अतः गौ तथा ब्राह्मणकी सदा विधिपूर्वक पूजा करे ॥ ४२ ॥
स्वदेशे परदेशे वाप्यतिथिं नोपवासयेत् ।
कर्म वै सफलं कृत्वा गुरूणां प्रतिपादयेत् ॥ ४३ ॥
स्वदेश या परदेशमें किसी अतिथिको भूखा न रहने दे। गुरुने जिस कामके लिये आज्ञा दी हो, उसे सफल करके उन्हें सूचित कर देना चाहिये ॥ ४३ ॥
गुरुभ्यस्त्वासनं देयमभिवाद्याभिपूज्य च ।
गुरुमभ्यर्च्य वर्धन्ते आयुषा यशसा श्रिया ॥ ४४ ॥
गुरुके आनेपर उन्हें प्रणाम करे और विधिवत् पूजा करके उन्हें बैठनेके लिये आसन दे। गुरुकी पूजा करनेसे मनुष्यके यश, आयु और श्रीकी वृद्धि होती है ॥ ४४ ॥
वृद्धान् नाभिभवेज्जातु न चैतान् प्रेषयेदिति ।
नासीनः स्यात् स्थितेष्वेवमायुरस्य न रिष्यते ॥ ४५ ॥
वृद्ध पुरुषोंका कभी तिरस्कार न करे। उन्हें किसी कामके लिये न भेजे तथा यदि वे खड़े हों तो स्वयं भी बैठा न रहे। ऐसा करनेसे उस मनुष्यकी आयु क्षीण नहीं होती है ॥ ४५ ॥
न नग्नामीक्षते नारीं न नग्नान् पुरुषानपि ।
मैथुनं सततं गुप्तमाहारं च समाचरेत् ॥ ४६ ॥
नंगी स्त्रीकी ओर न देखे, नग्न पुरुषोंकी ओर भी दृष्टिपात न करे। मैथुन और भोजन सदा एकान्त स्थानमें ही करे ॥ ४६ ॥
तीर्थानां गुरवस्तीर्थं चोक्षाणां हृदयं शुचि ।