महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1532, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंदर्शनानां परं ज्ञानं संतोषः परमं सुखम् ॥ ४७ ॥ तीर्थोंमें सर्वोत्तम तीर्थ गुरुजन ही हैं, पवित्र वस्तुओंमें हृदय ही अधिक पवित्र है। दर्शनों (ज्ञानों)-में परमार्थतत्त्वका ज्ञान ही सर्वश्रेष्ठ है तथा संतोष ही सबसे उत्तम सुख है ॥ ४७ ॥
सायं प्रातश्च वृद्धानां शृणुयात् पुष्कला गिरः । श्रुतमाप्नोति हि नरः सततं वृद्धसेवया ॥ ४८ ॥ सायंकाल और प्रातःकाल वृद्ध पुरुषोंकी कही हुई बातें पूरी-पूरी सुननी चाहिये। सदा वृद्ध पुरुषोंकी सेवासे मनुष्यको शास्त्रीय ज्ञान प्राप्त होता है ॥ ४८ ॥
स्वाध्याये भोजने चैव दक्षिणं पाणिमुद्धरेत् । यच्छेद्वाङ्मनसी नित्यमिन्द्रियाणि तथैव च ॥ ४९ ॥ स्वाध्याय और भोजनके समय दाहिना हाथ उठाना चाहिये तथा मन, वाणी और इन्द्रियोंको सदा अपने अधीन रखना चाहिये ॥ ४९ ॥
संस्कृतं पायसं नित्यं यवागूं कृसरं हविः । अष्टकाः पितृदैवत्या ग्रहाणामभिपूजनम् ॥ ५० ॥ अच्छे ढंगसे बनायी हुई खीर, हलुआ, खिचड़ी और हविष्य आदिके द्वारा देवताओं तथा पितरोंका अष्टका श्राद्ध करना चाहिये। नवग्रहोंकी पूजा करनी चाहिये ॥ ५० ॥
श्मश्रुकर्मणि मङ्गल्यं क्षुतानामभिनन्दनम् । व्याधितानां च सर्वेषामायुषामभिनन्दनम् ॥ ५१ ॥ मूँछ और दाढ़ी बनवाते समय मङ्गलसूचक शब्दोंका उच्चारण करना चाहिये। छींकनेवालेको (शतंजीव आदि कहकर) आशीर्वाद देना तथा रोगग्रस्त पुरुषोंका उनके दीर्घायु होनेकी शुभ कामना करते हुए अभिनन्दन करना चाहिये ॥ ५१ ॥
न जातु त्वमिति ब्रूयादापन्नोऽपि महत्तरम् । त्वंकारो वा वधो वेति विद्वत्सु न विशिष्यते ॥ ५२ ॥ युधिष्ठिर! तुम कभी बड़े-से-बड़े संकट पड़नेपर भी किसी श्रेष्ठ पुरुषके प्रति तुमका प्रयोग न करना। किसीको तुम कहकर पुकारना या उसका वध कर डालना—इन दोनोंमें विद्वान् पुरुष कोई अन्तर नहीं मानते ॥ ५२ ॥
अवराणां समानानां शिष्याणां च समाचरेत् । पापमाचक्षते नित्यं हृदयं पापकर्मिणः ॥ ५३ ॥ जो अपने बराबरके हों, अपनेसे छोटे हों अथवा शिष्य हों, उनको 'तुम' कहनमें कोई हर्ज नहीं है। पापकर्मी पुरुषका हृदय ही उसके पापको प्रकट कर देता है ॥ ५३ ॥
ज्ञानपूर्वकृतं कर्म च्छादयन्ते ह्यसाधवः । ज्ञानपूर्वं विनश्यन्ति गूहमाना महाजने ॥ ५४ ॥ दुष्ट मनुष्य जान-बूझकर किये हुए पापकर्मोंको भी दूसरेसे छिपानेका प्रयत्न करते हैं; किंतु महापुरुषोंके सामने अपने किये हुए पापोंको गुप्त रखनेके कारण वे नष्ट हो जाते