महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1533, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंहैं ॥ ५४ ॥ न मां मनुष्याः पश्यन्ति न मां पश्यन्ति देवताः । पापेनापिहितः पापः पापमेवाभिजायते ॥ ५५ ॥ 'मुझे पाप करते समय न मनुष्य देखते हैं और न देवता ही देख पाते हैं।' ऐसा सोचकर पापसे आच्छादित हुआ पापात्मा पुरुष पापयोनिमें ही जन्म लेता है? ॥ ५५ ॥ यथा वार्धुषिको वृद्धिं दिनभेदे प्रतीक्षते । धर्मेण पिहितं पापं धर्ममेवाभिवर्धयेत् ॥ ५६ ॥ जैसे सूदखोर जितने ही दिन बीतते हैं, उतनी ही वृद्धिकी प्रतीक्षा करता है। उसी प्रकार पाप बढ़ता है, परंतु यदि उस पापको धर्मसे दबा दिया जाय तो वह धर्मकी वृद्धि करता है ॥ ५६ ॥ यथा लवणमम्भोभिराप्लुतं प्रविलीयते । प्रायश्चित्तहतं पापं तथा सद्यः प्रणश्यति ॥ ५७ ॥ जैसे नमककी डली जलमें डालनेसे गल जाती है, उसी प्रकार प्रायश्चित्त करनेसे तत्काल पापका नाश हो जाता है ॥ ५७ ॥ तस्मात् पापं न गूहेत गूहमानं विवर्धयेत् । कृत्वा तत् साधुष्वाख्येयं ते तत् प्रशमयन्त्युत ॥ ५८ ॥ इसलिये अपने पापको न छिपाये। छिपाया हुआ पाप बढ़ता है। यदि कभी पाप बन गया हो तो उसे साधु पुरुषोंसे कह देना चाहिये। वे उसकी शान्ति कर देते हैं ॥ ५८ ॥ आशया संचितं द्रव्यं कालेनैवोपभुज्यते । अन्ये चैतत् प्रपद्यन्ते वियोगे तस्य देहिनः ॥ ५९ ॥ आशासे संचित किये हुए द्रव्यका काल ही उपभोग करता है। उस मनुष्यका शरीरसे वियोग होनेपर उस धनको दूसरे लोग प्राप्त करते हैं ॥ ५९ ॥ मानसं सर्वभूतानां धर्ममाहुर्मनीषिणः । तस्मात् सर्वाणि भूतानि धर्ममेव समासते ॥ ६० ॥ मनीषी पुरुष धर्मको समस्त प्राणियोंका हृदय कहते हैं। अतः समस्त प्राणियोंको धर्मका ही आश्रय लेना चाहिये ॥ ६० ॥ एक एव चरेद् धर्मं न धर्मध्वजिको भवेत् । धर्मवाणिजका ह्येते ये धर्ममुपभुञ्जते ॥ ६१ ॥ मनुष्यको चाहिये कि वह अकेला ही धर्मका आचरण करे। धर्मध्वजी (धर्मका दिखावा करनेवाला) न बने। जो धर्मको जीविकाका साधन बनाते हैं, उसके नामपर जीविका चलाते हैं, वे धर्मके व्यवसायी हैं ॥ ६१ ॥ अर्चेद् देवानदम्भेन सेवेतामायया गुरून् । निधिं निदध्यात् पारत्र्यं यात्रार्थं दानशब्दितम् ॥ ६२ ॥