भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1536, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1536

धनयुक्ताः स्वकर्मस्था दृश्यन्ते चापरेऽधनाः ॥ ६ ॥ कितने ही मनुष्य अनेक बार कुकर्म करके भी निर्धन ही देखे जाते हैं। कितने ही अपने धर्मानुकूल कर्तव्यका पालन करके धनवान् हो जाते और कोई निर्धन ही रह जाते हैं ॥ ६ ॥

अधीत्य नीतिशास्त्राणि नीतियुक्तो न दृश्यते । अनभिज्ञश्च साचिव्यं गमितः केन हेतुना ॥ ७ ॥ कोई मनुष्य नीतिशास्त्रका अध्ययन करके भी नीतियुक्त नहीं देखा जाता और कोई नीतिसे अनभिज्ञ होनेपर भी मन्त्रीके पदपर पहुँच जाता है। इसका क्या कारण है? ॥ ७ ॥

विद्यायुक्तो ह्यविद्यश्च धनवान् दुर्मतिस्तथा । यदि विद्यामुपाश्रित्य नरः सुखमवाप्नुयात् ॥ ८ ॥ न विद्वान् विद्यया हीनं वृत्त्यर्थमुपसंश्रयेत् । कभी-कभी विद्वान् और मूर्ख दोनों एक-जैसे धनी दिखायी देते हैं। कभी खोटी बुद्धिवाले मनुष्य तो धनवान् हो जाते हैं (और अच्छी बुद्धि रखनेवाले मनुष्यको थोड़ा-सा धन भी नहीं मिलता)। यदि विद्या पढ़कर मनुष्य अवश्य ही सुख पा लेता तो विद्वान्‌को जीविकाके लिये किसी मूर्ख धनीका आश्रय नहीं लेना पड़ता ॥ ८ १/२ ॥

यथा पिपासां जयति पुरुषः प्राप्य वै जलम् ॥ ९ ॥ इष्टार्थो विद्यया ह्येव न विद्यां प्रजहेन्नरः । जिस प्रकार पानी पीनेसे मनुष्यकी प्यास अवश्य बुझ जाती है, उसी प्रकार यदि विद्यासे अभीष्ट वस्तुकी सिद्धि अनिवार्य होती तो कोई भी मनुष्य विद्याकी उपेक्षा नहीं करता ॥ ९ १/२ ॥

नाप्राप्तकालो म्रियते विद्धः शरशतैरपि । तृणाग्रेणापि संस्पृष्टः प्राप्तकालो न जीवति ॥ १० ॥ जिसकी मृत्युका समय नहीं आया है, वह सैकड़ों बाणोंसे बिंधकर भी नहीं मरता; परंतु जिसका काल आ पहुँचा है, वह तिनकेके अग्रभागसे छू जानेपर भी प्राणोंका परित्याग कर देता है ॥ १० ॥

भीष्म उवाच

ईहमानः समारम्भान् यदि नासादयेद् धनम् । उग्रं तपः समारोहेन्न ह्यनुप्तं प्ररोहति ॥ ११ ॥ **भीष्मजीने कहा—**बेटा! यदि नाना प्रकारकी चेष्टा तथा अनेक उद्योग करनेपर भी मनुष्य धन न पा सके तो उसे उग्र तपस्या करनी चाहिये; क्योंकि बीज बोये बिना अंकुर नहीं पैदा होता ॥ ११ ॥

दानेन भोगी भवति मेधावी वृद्धसेवया ।