महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1539, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंतस्माद् विशुद्धमात्मानं जानीयाद् धर्मचारिणम् ॥ ६ ॥ काल किसी तरह धर्मको अधर्म नहीं बना सकता अर्थात् धर्म करनेवालेको दुःख नहीं दे सकता। इसलिये धर्माचरण करनेवाले पुरुषको विशुद्ध आत्मा ही समझना चाहिये ॥ ६ ॥
स्प्रष्टुमप्यसमर्थो हि ज्वलन्तमिव पावकम् । अधर्मः संततो धर्मं कालेन परिरक्षितम् ॥ ७ ॥ धर्मका स्वरूप प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी है, काल उसकी सब ओरसे रक्षा करता है। अतः अधर्ममें इतनी शक्ति नहीं है कि वह फैलकर धर्मको छू भी सके ॥ ७ ॥
कार्यावेतौ हि धर्मेण धर्मो हि विजयावहः । त्रयाणामपि लोकानामालोकः कारणं भवेत् ॥ ८ ॥ विशुद्ध और पापके स्पर्शका अभाव—ये दोनों धर्मके कार्य हैं। धर्म विजयकी प्राप्ति करानेवाला और तीनों लोकोंमें प्रकाश फैलानेवाला है। वही इस लोककी रक्षाका कारण है ॥ ८ ॥
न तु कश्चिन्नयेत् प्राज्ञो गृहीत्वैव करे नरम् । उच्यमानस्तु धर्मेण धर्मलोकभयच्छले ॥ ९ ॥ कोई कितना ही बुद्धिमान् क्यों न हो, वह किसी मनुष्यका हाथ पकड़कर उसे बलपूर्वक धर्ममें नहीं लगा सकता; किंतु न्यायानुसार धर्ममय तथा लोकभयका बहाना लेकर उस पुरुषको धर्मके लिये कह सकता है ॥ ९ ॥
शूद्रोऽहं नाधिकारो मे चातुराश्रम्यसेवने । इति विज्ञानमपरे नात्मन्युपदधत्युत ॥ १० ॥ मैं शूद्र हूँ, अतः ब्रह्मचर्य आदि चारों आश्रमोंके सेवनका मुझे अधिकार नहीं है—शूद्र ऐसा सोचा करता है, परंतु साधु द्विजगण अपने भीतर छलको आश्रय नहीं देते हैं ॥ १० ॥
विशेषेण च वक्ष्यामि चातुर्वर्ण्यस्य लिङ्गतः । पञ्चभूतशरीराणां सर्वेषां सदृशात्मनाम् ॥ ११ ॥ लोकधर्मे च धर्मे च विशेषकरणं कृतम् । यथैकत्वं पुनर्यान्ति प्राणिनस्तत्र विस्तरः ॥ १२ ॥ अब मैं चारों वर्णोंका विशेषरूपसे लक्षण बता रहा हूँ। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—इन चारों वर्णोंके शरीर पञ्च महाभूतोंसे ही बने हुए हैं और सबका आत्मा एक-सा ही है। फिर भी उनके लौकिक धर्म और विशेष धर्ममें विभिन्नता रखी गयी है। इसका उद्देश्य यही है कि सब लोग अपने-अपने धर्मका पालन करते हुए पुनः एकत्वको प्राप्त हों। इसका शास्त्रोंमें विस्तारपूर्वक वर्णन है ॥ ११-१२ ॥
अध्रुवो हि कथं लोकः स्मृतो धर्मः कथं ध्रुवः । यत्र कालो ध्रुवस्तात तत्र धर्मः सनातनः ॥ १३ ॥