महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः
नित्यस्मरणीय देवता, नदी, पर्वत, ऋषि और राजाओंके नाम-कीर्तनका माहात्म्य
वैशम्पायन उवाच
शरतल्पगतं भीष्मं पाण्डवोऽथ कुरूद्वहः ।
युधिष्ठिरो हितं प्रेप्सुरपृच्छत् कल्मषापहम् ।। १ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तदनन्तर कुरुकुलतिलक पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने अपने हितकी इच्छा रखकर बाणशय्यापर सोये हुए भीष्मजीसे यह पापनाशक विषय पूछा ।। १ ।।
युधिष्ठिर उवाच
किं श्रेयः पुरुषस्येह किं कुर्वन् सुखमेधते ।
विपाप्मा स भवेत् केन किं वा कल्मषनाशनम् ।। २ ।।
युधिष्ठिर बोले— पितामह! यहाँ मनुष्यके कल्याणका उपाय क्या है? क्या करनेसे वह सुखी होता है? किस कर्मके अनुष्ठानसे उसका पाप दूर होता है? अथवा कौन-सा कर्म पाप नष्ट करनेवाला है? ।। २ ।।
वैशम्पायन उवाच
तस्मै शुश्रूषमाणाय भूयः शान्तनवस्तदा ।
दैवं वंशं यथान्यायमाचष्ट पुरुषर्षभ ।। ३ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं— पुरुषप्रवर जनमेजय! उस समय शान्तनुनन्दन भीष्मने सुननेकी इच्छावाले युधिष्ठिरसे पुनः न्यायपूर्वक देववंशका वर्णन आरम्भ किया ।। ३ ।।
भीष्म उवाच
अयं दैवतवंशो वै ऋषिवंशसमन्वितः ।
त्रिसंध्यं पठितः पुत्र कल्मषापहरः परः ।। ४ ।।
यदह्ना कुरुते पापमिन्द्रियैः पुरुषश्चरन् ।
बुद्धिपूर्वमबुद्धिर्वा रात्रौ यच्चापि संध्ययोः ।। ५ ।।
मुच्यते सर्वपापेभ्यः कीर्तयन् वै शुचिः सदा ।
नान्धो न बधिरः काले कुरुते स्वस्तिमान् सदा ।। ६ ।।
भीष्मजीने कहा— बेटा! यदि तीनों संध्याओंके समय देववंश और ऋषिवंशका पाठ किया जाय तो मनुष्य दिन-रात, सबेरे-शाम अपनी इन्द्रियोंके द्वारा जानकर या अनजानमें