महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1554, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंनाना देशोंसे आये हुए नरेश, जो मरनेसे बच गये थे, रक्षक बनकर चारों ओरसे महात्मा भीष्मकी रक्षा करते थे ॥ १४ ॥
शयानं वीरशयने ददर्श नृपतिस्ततः ।
ततो रथादवातीर्य भ्रातृभिः सह धर्मराट् ॥ १५ ॥
धर्मराज राजा युधिष्ठिर दूरसे ही बाणशय्यापर सोये हुए भीष्मजीको देखकर भाइयोंसहित रथसे उतर पड़े ॥ १५ ॥
अभिवाद्याथ कौन्तेयः पितामहमरिंदम ।
द्वैपायनादीन् विप्रांश्च तैश्च प्रत्यभिनन्दितः ॥ १६ ॥
शत्रुदमन नरेश! कुन्तीकुमारने सबसे पहले पितामहको प्रणाम किया। उसके बाद व्यास आदि ब्राह्मणोंको मस्तक झुकाया। फिर उन सबने भी उनका अभिनन्दन किया ॥ १६ ॥
ऋत्विग्भिर्ब्रह्मकल्पैश्च भ्रातृभिः सह धर्मजः ।
आसाद्य शरतल्पस्थमृषिभिः परिवारितम् ॥ १७ ॥
अब्रवीद् भरतश्रेष्ठं धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
भ्रातृभिः सह कौरव्यः शयानं निम्नगासुतम् ॥ १८ ॥
तदनन्तर कुरुनन्दनके धर्मपुत्र धर्मराज युधिष्ठिर ब्रह्माजीके समान तेजस्वी ऋत्विजों, भाइयों तथा ऋषियोंसे घिरे और बाण-शय्यापर सोये हुए भरतश्रेष्ठ गंगापुत्र भीष्मजीसे भाइयोंसहित इस प्रकार बोले— ॥ १७-१८ ॥
युधिष्ठिरोऽहं नृपते नमस्ते जाह्नवीसूत ।
शृणोषि चेन्महाबाहो ब्रूहि किं करवाणि ते ॥ १९ ॥
‘गंगानन्दन! नरेश्वर! महाबाहो! मैं युधिष्ठिर आपकी सेवामें उपस्थित हूँ और आपको नमस्कार करता हूँ। यदि आपको मेरी बात सुनायी देती हो तो आज्ञा दीजिये कि मैं आपकी क्या सेवा करूँ? ॥ १९ ॥
प्राप्तोऽस्मि समये राजन्नग्नीनादाय ते विभो ।
आचार्यान् ब्राह्मणांश्चैव ऋत्विजो भ्रातरश्च मे ॥ २० ॥
‘राजन्! प्रभो! आपकी अग्नियों और आचार्यों, ब्राह्मणों तथा ऋत्विजोंको साथ लेकर मैं अपने भाइयोंके साथ ठीक समयपर आ पहुँचा हूँ ॥ २० ॥
पुत्रश्च ते महातेजा धृतराष्ट्रो जनेश्वरः ।
उपस्थितः सहामात्यो वासुदेवश्च वीर्यवान् ॥ २१ ॥
‘आपके पुत्र महातेजस्वी राजा धृतराष्ट्र भी अपने मन्त्रियोंके साथ उपस्थित हैं और महापराक्रमी भगवान् श्रीकृष्ण भी यहाँ पधारे हुए हैं ॥ २१ ॥
हतशिष्टाश्च राजानः सर्वे च कुरुजांगलाः ।
तान् पश्य नरशार्दूल समुन्मीलय लोचने ॥ २२ ॥