भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1555, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1555

‘पुरुषसिंह! युद्धमें मरनेसे बचे हुए समस्त राजा और कुरुजांगल देशकी प्रजा भी उपस्थित है। आप आँखें खोलिये और इन सबको देखिये ।। २२ ।। यच्चेह किंचित् कर्तव्यं तत्सर्वं प्रापितं मया । यथोक्तं भवता काले सर्वमेव च तत् कृतम् ।। २३ ।। ‘आपके कथनानुसार इस समयके लिये जो कुछ संग्रह करना आवश्यक था, वह सब जुटाकर मैंने यहाँ पहुँचा दिया है। सभी उपयोगी वस्तुओंका प्रबन्ध कर लिया गया है’ ।। २३ ।।

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तस्तु गाङ्गेयः कुन्तीपुत्रेण धीमता । ददर्श भारतान् सर्वान् स्थितान् सम्परिवार्य ह ।। २४ ।। **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! परम बुद्धिमान् कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरके इस प्रकार कहनेपर गंगानन्दन भीष्मजीने आँखें खोलकर अपनेको सब ओरसे घेरकर खड़े हुए सम्पूर्ण भरतवंशियोंको देखा ।। २४ ।। ततश्च तं बली भीष्मः प्रगृह्य विपुलं भुजम् । उद्यन्मेघस्वरो वाग्मी काले वचनमब्रवीत् ।। २५ ।। फिर प्रवचनकुशल बलवान् भीष्मने युधिष्ठिरकी विशाल भुजा हाथमें लेकर मेघके समान गम्भीर वाणीमें यह समयोचित वचन कहा— ।। २५ ।। दिष्ट्या प्राप्तोऽसि कौन्तेय सहामात्यो युधिष्ठिर । परिवृत्तो हि भगवान् सहस्रांशुर्दिवाकरः ।। २६ ।। ‘कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर! सौभाग्यकी बात है कि तुम मन्त्रियोंसहित यहाँ आ गये। सहस्र किरणोंसे सुशोभित भगवान् सूर्य अब दक्षिणायनसे उत्तरायणकी ओर लौट चुके हैं ।। २६ ।। अष्टपञ्चाशतं रात्र्यः शयानस्याद्य मे गताः । शरेषु निशिताग्रेषु यथा वर्षशतं तथा ।। २७ ।। ‘इन तीखे अग्रभागवाले बाणोंकी शय्यापर शयन करते हुए आज मुझे अट्ठावन दिन हो गये; किंतु ये दिन मेरे लिये सौ वर्षोंके समान बीते हैं ।। २७ ।। माघोऽयं समनुप्राप्तो मासः सौम्यो युधिष्ठिर । त्रिभागशेषः पक्षोऽयं शुक्लो भवितुमर्हति ।। २८ ।। ‘युधिष्ठिर! इस समय चान्द्रमासके अनुसार माघका महीना प्राप्त हुआ है। इसका यह शुक्लपक्ष चल रहा है, जिसका एक भाग बीत चुका है और तीन भाग बाकी है (शुक्लपक्षसे मासका आरम्भ माननेपर आज माघ शुक्ला अष्टमी प्रतीत होती है)’ ।। २८ ।। एवमुक्त्वा तु गाङ्गेयो धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् ।