महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1556, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंधृतराष्ट्रमामन्त्र्य काले वचनमब्रवीत् ॥ २९ ॥ धर्मपुत्र युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर गंगानन्दन भीष्मने धृतराष्ट्रको पुकारकर उनसे यह समयोचित वचन कहा— ॥ २९ ॥
भीष्म उवाच
राजन् विदितधर्मोऽसि सुनिर्णीतार्थसंशयः । बहुश्रुता हि ते विप्रा बहवः पर्युपासिताः ॥ ३० ॥ **भीष्मजी बोले—**राजन्! तुम धर्मको अच्छी तरह जानते हो। तुमने अर्थतत्त्वका भी भलीभाँति निर्णय कर लिया है। अब तुम्हारे मनमें किसी प्रकारका संदेह नहीं है; क्योंकि तुमने अनेक शास्त्रोंका ज्ञान रखनेवाले बहुत-से विद्वान् ब्राह्मणोंकी सेवा की है—उनके सत्संगसे लाभ उठाया है ॥ ३० ॥
वेदशास्त्राणि सर्वाणि धर्मांश्च मनुजेश्वर । वेदांश्च चतुरः सर्वान् निखिलेनानुबुद्ध्यसे ॥ ३१ ॥ मनुजेश्वर! तुम चारों वेदों, सम्पूर्ण शास्त्रों और धर्मोंका रहस्य पूर्णरूपसे जानते और समझते हो ॥ ३१ ॥
न शोचितव्यं कौरव्य भवितव्यं हि तत् तथा । श्रुतं देवरहस्यं ते कृष्णद्वैपायनादपि ॥ ३२ ॥ कुरुनन्दन! तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये। जो कुछ हुआ है, वह अवश्यम्भावी था। तुमने श्रीकृष्ण-द्वैपायन व्यासजीसे देवताओंका रहस्य भी सुन लिया है (उसीके अनुसार महाभारतयुद्धकी सारी घटनाएँ हुई हैं) ॥ ३२ ॥
यथा पाण्डोः सुता राजंस्तथैव तव धर्मतः । तान् पालय स्थितो धर्मे गुरुशुश्रूषणे रतान् ॥ ३३ ॥ ये पाण्डव जैसे राजा पाण्डुके पुत्र हैं, वैसे ही धर्मकी दृष्टिसे तुम्हारे भी हैं। ये सदा गुरुजनोंकी सेवामें संलग्न रहते हैं। तुम धर्ममें स्थित रहकर अपने पुत्रोंके समान ही इनका पालन करना ॥ ३३ ॥
धर्मराजो हि शुद्धात्मा निदेशे स्थास्यते तव । आनृशंस्यपरं ह्येनं जानामि गुरुवत्सलम् ॥ ३४ ॥ धर्मराज युधिष्ठिरका हृदय बहुत ही शुद्ध है। ये सदा तुम्हारी आज्ञाके अधीन रहेंगे। मैं जानता हूँ, इनका स्वभाव बहुत ही कोमल है और ये गुरुजनोंके प्रति बड़ी भक्ति रखते हैं ॥ ३४ ॥
तव पुत्रा दुरात्मानः क्रोधलोभपरायणाः । ईर्ष्याभिभूता दुर्वृत्तास्तान् न शोचितुमर्हसि ॥ ३५ ॥