भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1558, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1558

है।' इस प्रकार बार-बार कहनेपर भी उस मन्दबुद्धि मूढ़ने मेरी वह बात नहीं मानी और सारी पृथ्वीके वीरोंका नाश कराकर अन्तमें वह स्वयं भी कालके गालमें चला गया ॥ ४०—४२ ॥

त्वां तु जानाम्यहं देवं पुराणमृषिसत्तमम् । नरेण सहितं देव बदर्यां सुचिरोषितम् ॥ ४३ ॥ देव! मैं आपको जानता हूँ। आप वे ही पुरातन ऋषि नारायण हैं, जो नरके साथ चिरकालतक बदरिकाश्रममें निवास करते रहे हैं ॥ ४३ ॥

तथा मे नारदः प्राह व्यासश्च सुमहातपाः । नरनारायणावेतौ सम्भूतौ मनुजेष्विति ॥ ४४ ॥ देवर्षि नारद तथा महातपस्वी व्यासजीने भी मुझसे कहा था कि ये श्रीकृष्ण और अर्जुन साक्षात् भगवान् नारायण और नर हैं, जो मानव-शरीरमें अवतीर्ण हुए हैं ॥ ४४ ॥

स मां त्वमनुजानीहि कृष्ण मोक्ष्ये कलेवरम् । त्वयाहं समनुज्ञातो गच्छेयं परमां गतिम् ॥ ४५ ॥ श्रीकृष्ण! अब आप आज्ञा दीजिये, मैं इस शरीरका परित्याग करूँगा। आपकी आज्ञा मिलनेपर मुझे परम गतिकी प्राप्ति होगी ॥ ४५ ॥

वासुदेव उवाच

अनुजानामि भीष्म त्वां वसून् प्राप्नुहि पार्थिव । न तेऽस्ति वृजिनं किंचिदिहलोके महाद्युते ॥ ४६ ॥ भगवान् श्रीकृष्णने कहा—पृथ्वीपालक महातेजस्वी भीष्मजी! मैं आपको (सहर्ष) आज्ञा देता हूँ। आप वसुलोकको जाइये। इस लोकमें आपके द्वारा अणुमात्र भी पाप नहीं हुआ है ॥ ४६ ॥

पितृभक्तोऽसि राजर्षे मार्कण्डेय इवापरः । तेन मृत्युस्तव वशे स्थितो भृत्य इवानतः ॥ ४७ ॥ राजर्षे! आप दूसरे मार्कण्डेयके समान पितृभक्त हैं; इसलिये मृत्यु विनीत दासीके समान आपके वशमें हो गयी है ॥ ४७ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तस्तु गाङ्गेयः पाण्डवानिदमब्रवीत् । धृतराष्ट्रमुखांश्चापि सर्वांश्च सुहृदस्तथा ॥ ४८ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! भगवान्‌के ऐसा कहनेपर गंगानन्दन भीष्मने पाण्डवों तथा धृतराष्ट्र आदि सभी सुहृदोंसे कहा— ॥ ४८ ॥

प्राणानुत्स्रष्टुमिच्छामि तत्रानुज्ञातुमर्हथ । सत्येषु यतितव्यं वः सत्यं हि परमं बलम् ॥ ४९ ॥