भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1576, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1576

यज्ञोंद्वारा ही महामनस्वी देवताओंका महत्त्व अधिक हुआ है और यज्ञोंसे ही क्रियानिष्ठ देवताओंने दानवोंको परास्त किया है ॥ ७ ॥

राजसूयाश्वमेधौ च सर्वमेधं च भारत ।
नरमेधं च नृपते त्वमाहर युधिष्ठिर ॥ ८ ॥
भरतवंशी नरेश युधिष्ठिर! तुम राजसूय, अश्वमेध, सर्वमेध और नरमेध यज्ञ करो ॥ ८ ॥

यजस्व वाजिमेधेन विधिवद् दक्षिणावता ।
बहुकामान्नवित्तेन रामो दाशरथिर्यथा ॥ ९ ॥
विधिवत् दक्षिणा देकर बहुत-से मनोवांछित पदार्थ, अन्न और धनसे सम्पन्न अश्वमेध यज्ञके द्वारा दशरथनन्दन श्रीरामकी भाँति यजन करो ॥ ९ ॥

यथा च भरतो राजा दौष्यन्तिः पृथिवीपतिः ।
शाकुन्तलो महावीर्यस्तव पूर्वपितामहः ॥ १० ॥
तथा तुम्हारे पूर्वपितामह महापराक्रमी दुष्यन्तकुमार शकुन्तलानन्दन पृथ्वीपति राजा भरतने जैसे यज्ञ किया था, उसी प्रकार तुम भी करो ॥ १० ॥

युधिष्ठिर उवाच

असंशयं वाजिमेधः पावयेत् पृथिवीमपि ।
अभिप्रायस्तु मे कश्चित् तं त्वं श्रोतुमिहार्हसि ॥ ११ ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**विप्रवर! इसमें संदेह नहीं कि अश्वमेध यज्ञ सारी पृथ्वीको भी पवित्र कर सकता है, किंतु इसके विषयमें मेरा एक अभिप्राय है, उसे आप यहाँ सुन लें ॥ ११ ॥

इमं ज्ञातिवधं कृत्वा सुमहान्तं द्विजोत्तम ।
दानमल्पं न शक्नोमि दातुं वित्तं च नास्ति मे ॥ १२ ॥
द्विजश्रेष्ठ! अपने जाति-भाइयोंका यह महान् संहार करके अब मुझमें थोड़ा-सा भी दान देनेकी शक्ति नहीं रह गयी है; क्योंकि मेरे पास धन नहीं है ॥ १२ ॥

न तु बालानिमान् दीनानुत्सहे वसु याचितुम् ।
तथैवार्द्रव्रणान् कृच्छ्रे वर्तमानान् नृपात्मजान् ॥ १३ ॥
यहाँ जो राजकुमार उपस्थित हैं, ये सब-के-सब बालक और दीन हैं, महान् संकटमें पड़े हुए हैं और इनके शरीरका घाव भी अभी सूखने नहीं पाया है; अतः इन सबसे मैं धनकी याचना नहीं कर सकता ॥ १३ ॥

स्वयं विनाश्य पृथिवीं यज्ञार्थं द्विजसत्तम ।
करमाहारयिष्यामि कथं शोकपरायणः ॥ १४ ॥
द्विजश्रेष्ठ! स्वयं ही सारी पृथ्वीका विनाश कराकर शोकमग्न हुआ मैं इनसे यज्ञके लिये कर किस तरह वसूल करूँगा ॥ १४ ॥