महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1582, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंउन प्रभावशाली नरेशने विधिपूर्वक सौ अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान किया था। साक्षात् विद्वान् प्रभु, अंगिरा मुनिने ही उनका यज्ञ कराया था॥ २२॥
तस्य पुत्रोऽतिचक्राम पितरं गुणवत्तया।
मरुत्तो नाम धर्मज्ञश्चक्रवर्ती महायशाः ॥ २३ ॥
उन्हींके पुत्र हुए महायशस्वी, चक्रवर्ती, धर्मज्ञ राजा मरुत्त। जो अपने गुणोंके कारण पितासे भी बढ़े-चढ़े थे ॥ २३ ॥
नागायुतसमप्राणः साक्षाद् विष्णुरिवापरः।
स यक्ष्यमाणो धर्मात्मा शातकुम्भमयान्युत ॥ २४ ॥
कारयामास शुभ्राणि भाजनानि सहस्रशः।
उनमें दस हजार हाथियोंके समान बल था। वे साक्षात् दूसरे विष्णुके समान जान पड़ते थे। धर्मात्मा मरुत्त जब यज्ञ करनेको उद्यत हुए, उस समय उन्होंने सहस्रों सोनेके समुज्ज्वल पात्र बनवाये ॥ २४ १/२ ॥
मेरुं पर्वतमासाद्य हिमवत्पार्श्व उत्तरे ॥ २५ ॥
काञ्चनः सुमहान् पादस्तत्र कर्म चकार सः।
ततः कुण्डानि पात्रींश्च पिठराण्यासनानि च ॥ २६ ॥
चक्रुः सुवर्णकर्तारो येषां संख्या न विद्यते।
तस्यैव च समीपे तु यज्ञवाटो बभूव ह ॥ २७ ॥
हिमालय पर्वतके उत्तर भागमें मेरु पर्वतके निकट एक महान् सुवर्णमय पर्वत है। उसीके समीप उन्होंने यज्ञशाला बनवायी और वहीं यज्ञ-कार्य आरम्भ किया। उनकी आज्ञासे अनेक सुनारोंने आकर सुवर्णमय कुण्ड, सोनेके बर्तन, थाली और आसन (चौकी आदि) तैयार किये। उन सब वस्तुओंकी गणना असम्भव है॥ २५—२७॥
ईजे तत्र स धर्मात्मा विधिवत् पृथिवीपतिः।
मरुत्तः सहितैः सर्वैः प्रजापालैर्नराधिपः ॥ २८ ॥
जब सब सामग्री तैयार हो गयी, तब वहाँ धर्मात्मा, पृथिवीपति राजा मरुत्तने अन्य सब प्रजापालोंके साथ विधिपूर्वक यज्ञ किया ॥ २८ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि संवर्तमरुत्तीये चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें संवर्त और मरुत्तका उपाख्यानविषयक चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥ ४ ॥