महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextअग्निदेवने कहा— राजन्! यदि बृहस्पतिजी आपका यज्ञ करायेंगे तो देवराज इन्द्रके प्रसादसे देवलोकके भीतर जितने बड़े-बड़े लोक हैं, वे सभी आपके लिये सुलभ हो जायँगे। निश्चय ही आप यशस्वी होनेके साथ ही स्वर्गपर भी विजय प्राप्त कर लेंगे। मानवलोक, दिव्यलोक, महान् प्रजापतिलोक और सम्पूर्ण देवराज्यपर भी आपका अधिकार हो जायगा ।। १७-१८ ।।
संवर्त उवाच
मा स्मैव त्वं पुनरागाः कथंचिद् बृहस्पतिं परिदातुं मरुत्ते । मा त्वां धक्ष्ये चक्षुषा दारुणेन संक्रुद्धोऽहं पावक त्वं निबोध ।। १९ ।। संवर्तने कहा— अग्ने! तुम मेरी इस बातको अच्छी तरह समझ लो कि अबसे फिर कभी बृहस्पतिको मरुत्तके पास पहुँचानेके लिये तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिये। नहीं तो क्रोधमें भरकर मैं अपनी दारुण दृष्टिसे तुम्हें भस्म कर डालूँगा ।। १९ ।।
व्यास उवाच
ततो देवानगमद् धूमकेतु- र्दाहाद् भीतो व्यथितोऽश्वत्थपर्णवत् । तं वै दृष्ट्वा प्राह शक्रो महात्मा बृहस्पतेः संनिधौ हव्यवाहम् ।। २० ।। यस्त्वं गतः प्रहितो जातवेदो बृहस्पतिं परिदातुं मरुत्ते । तत् किं प्राह स नृपो यक्ष्यमाणः कच्चिद् वचः प्रतिगृह्णाति तच्च ।। २१ ।। व्यासजी कहते हैं— संवर्तकी बात सुनकर अग्निदेव भस्म होनेके भयसे व्यथित हो पीपलके पत्तेकी तरह काँपते हुए तुरंत देवताओंके पास लौट गये। उन्हें आया देख महामना इन्द्रने बृहस्पतिजीके सामने ही पूछा—'अग्निदेव! तुम तो मेरे भेजनेसे बृहस्पतिजीको राजा मरुत्तके पास पहुँचानेका संदेश लेकर गये थे। बताओ, यज्ञकी तैयारी करनेवाले राजा मरुत्त क्या कहते हैं? वे मेरी बात मानते हैं या नहीं?' ।। २०-२१ ।।
अग्निरुवाच
न ते वाचं रोचयते मरुत्तो बृहस्पतेरञ्जलिं प्राहिणोत् सः । संवर्तो मां याजयितेत्युवाच